शम्भु विश्वकर्मा
वर्तमान काव्यधारा के छुपे रुस्तम
साथी कुमार वीरेन्द्र की कविताएँ गाँव की सोंधी मिट्टी से निकलती हैं। इनके शब्द दुश्मन के लिए पत्थर तो दोस्त के लिए फूल बनकर आते हैं। जहाँ वर्तमान कविताओं में येन-केन-प्रकारेण राजनीति घुस ही जाती है, वहीं इनकी रचनाएँ राजनीति को बिना छुए राजनीति को रास्ता दिखाती महसूस होती है। इनकी रचनाओं का शिल्प एक वाद पैदा करता है जिसमें केवल और केवल वीरेन्द्रीयत होता है। गाँव की पगडंडियों की तरह ऊबड़-खाबड़, ग्रामीण जीवन की तरह सीधी-सादी और उमकती-बहकती, खर्राटे भरती, मवेशियों को हाँकती, खलिहान अगोरती, चौपाल में कीर्तन करती कुमार वीरेन्द्र की रचनाएँ भारत का स्वभाविक दर्शन हैं। उन्नीसवीं सदी में फ़्रेेेेेडरिक मैक्समूलर ने शायद ऐसा ही भारत देखकर अंग्रेज़ अधिकारियों को चेतावनी दी थी कि अगर भारत का वास्तविक दर्शन करना चाहते हो तो दिल्ली, बम्बई या कलकत्ता में नहीं, गाँवों में जाकर देखो। कुमार वीरेन्द्र से हमारी दोस्ती ज़िन्दाबाद !
(नोट : हिन्दी के सुपरिचित
शायर और कवि शम्भु विश्वकर्मा जी के फ़ेसबुक पर 18 मार्च, 2018 को पोस्ट की गई टिप्पणी)
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