Tuesday, February 23, 2016

केवाल
02
मेरे सृजन की राह में...!

 --- कुमार वीरेन्द्र





आज मेरी पोस्ट पर एक टिप्पणी एक ऐसे शख़्स की मिली, जिसने मुझे साहित्य में ही नहीं, सड़कों पर भी अंगुली पकड़कर चलना सिखाया था...!

एक शख़्स, जिसने साहित्य के साथ-साथ, मनुष्यों की मुक्ति के भी रास्ते बताए, और उन पर चलना भी सिखाया...और हो कितना भी अँधेरा, चलता जा रहा...!

एक शख़्स, जो चाहता तो मेरी रचनाएँ कहीं भी छप जातीं, लेकिन वह मुझे ख़ुद अपनी ताक़त पर खड़ा होते देखना चाहता था...जैसे चाहता है एक पिता अपने बच्चे के बारे में...!

एक शख़्स, जिसके पास अगर साइकिल से दुपहर को पहुँचता, तो सबसे पहले खाने के बारे में ज़रूर पूछता कि उसे लगता, कविता की धुन में कोसों साइकिल चलाकर आया यह लड़का कहीं बिना खाए तो नहीं चला आया...!

एक शख़्स, जब एक बार घायल स्थिति में पहुँचा तो अपनी पत्नी के साथ जाने कब तक जगा रहा, कि मुझे होश आए तो देखा आँखें भारी हैं...!

एक शख़्स, जिसकी हज़ारों यादें साथ, मेरे सृजन की राह में...!

...देश का जन साहित्य में उन्हें हिन्दी के महत्त्वपूर्ण कवि-लेखक निलय उपाध्याय के नाम से जानता है...मेरी किसी कविता को लक्ष्य करके लिखी यह उनकी पहली टिप्पणी है...!

...इस अनमोल स्नेह को प्रणाम...!

०००


निलय उपाध्‍याय

कुमार वीरेन्द्र कविता पढ़ी। उतरना। मन भींग गया। बहुत दिनों से ऎसी कविता नहीं पढ़ी।

अब सोच रहा हूँ कि क्या है इस कविता में जिसके कारण यह कह रहा हूँ !

कविता का भूगोल मेरी समझ से कुमार का गाँव है। कुमार के गाँव के इलाक़े में मैंने दो साल नौकरी की है। उस इलाक़े में एक मुहावरा है, मछली की पीठ पर बसे हैं गाँव। कब कटाव में गिर कर गंगा की गोद में समा जाएँ, कहा नहीं जा सकता। इस इलाक़े में हर साल त्योहार की तरह आती है बाढ़ जिसके कारण एक ही फ़सल होती है। यह चना वह फ़सल है जिसके लिए किसान अपने खेत पर है। साथ में वह अपनी बेटी को ले गया है ताकि मन लगा रहेगा। चना की फ़सल और बेटी जुड़कर एक हो जाते हैं। किसान को पानी की चिन्ता होती है क्योंकि धूप है। उसकी बेटी उसे जब बाँध के संकट से जोड़ती है, वह उसी संवेदना के साथ खेती के संकट से जुड़ जाता है। इतनी नन्ही बच्ची, खेत में बाँध के साथ खेल रही थी उसका सुर टूट गया, यह कविता इतनी सारी बातें इतनी सूक्ष्मता से कहती है और एक ख़ूबसूरत चित्र बनाती यह अनुभवजन्य कविता है। सरल सहज और जीवन के असली रंग के साथ...!

मन प्रसन्न हो गया कुमार...!
ख़ुश रहो !

०००


 जब नींद मेंं भी  
जब रात
खर्राटे लेने लगी
मैंने कहा, ‘‘चलो, भानु दा
घर चलते हैं, बहुत हो गई
मकई की रखवारी...’’

चुप रहे, भानु दा
और बीड़ी सुलगाते रहे
जब सुलग गई, तो कहा
‘‘कहाँ चलें, और कहाँ
न चलें, नहीं बुझाता, भाई...’’

फिर ज़ोरों की एक ऐसी फूँक
लगा दम उखड़ जाएगा
पर, धुएँ के साथ, बोले
‘‘घर जाकर भी
क्या करेंगे, कर लेंगे, भाई
जब नींद में भी 

नीलगाय
और घोड़पड़ास ही
भगाना है...!’’



उड़ाह

वह
दुपहर

आज भी
आज भी याद है
जब घर के चारों तरफ़
खोद-खोद देखी जा रही थी
नींव कि बँटवारे में, किसी में
एक ईंट, जादे न चली जाए

तब, किसे
फिकर, इस फाँक-फाँक
से दूर, सुबह से, कहाँ हैं
बाबा

जब आजी ने
गुड़-पानी दे, भेजा, देखा
बाबा कुदाल चला रहे, नज़र
पड़ते, आए, बैठे, पसीना पोंछा
और बस, खेत ताकते रहे
और गट-गट, एक ही साँस
लोटे का, पी गए पानी
बिन जुठियाए, गुड़

मैं छोटा था, पर
इतना तो, बूझ ही सकता था
बाबा, बुझे-बुझे काहे

पूछा, ‘‘बाबा, और पानी ला दूँ...’’
‘‘ना रहने दे, बेटा...अब जा
...घाम बहुते तेज है...’’
जाने से पहले, फिर पूछा
‘‘बाबा, घर, नाहीं चलोगे...’’
‘‘अपने हाथों मेंड़ दे दूँ, बेटा
नाहीं तो सब, एक-एक बित्ते
के लिए, कट-मर जाएँगे...’’

‘‘तो खेतवो बाँट रहे हो, बाबा...’’
‘‘जब जिनगी ही बँट गई, खेत में
का रखा है, बेटा...’’, और कान्हे
कुदाल उठाते, मेरी आँखों में
जाने का तो ढूँढ़ते, बोले

‘‘...बेटा, ई गमछी ओढ़ ले
बेर गिर जाए तो एक लोटा
पानी, और लेते आना...
सोच रहा हूँ, राह भी
बना ही दूँ

नाहीं तो का पता
ये, कल किसी के
गोड़ भी

काट दें...!’’


पार

धार ऐसी
रात में जाने कब
फाँस तुड़ा, दह गई नाव
जिसकी आस में
आई थी वह, होने को पार

बहन को नदी तक
छोड़ने आया भाई, कहता रहा
‘‘इचिको ना सोचो, दीदी
इचिको ना, लौट चलो...’’
और वह थी कि, इस कोर से
उस कोर, ताक रही थी
ताड़ रही थी

‘‘बाबू मोरे, जा, तू जा घरे
हम चली जाइब...’’

जब उसने कहा
हम दो संघतिया, मछरी
का मारें, धक् से रह गए
और उसने नहीं मानी
हमरी भी बात, रो पड़ी
बूझ गए, कोई आफ़त
रे आफ़त

और वह
उतरने ही लगी,
उफनती, हफनाती नदी में
बूझ के भी सूझ न रहा था
कैसे रोकें, किसे बुलाएँ

रो रहा था भाई
थे खड़े हम, अपनी ही
उमर, के कन्धे पर, रखे हाथ
कि तैरना तो जानते थे, पर
ऐसी नदी नहीं, और बचाना
अभी सीखना था

हमने डूबे हुए
कइयों को देखा था
डूबते हुए अब देखना था

वह तैर रही थी
इस बाँध से उस बाँध
बढ़ियाई नदी, और जब-जब
धार उठाती-गिराती, अपनी
आँखें बन्द, बन्द हो जातीं
कि गई, वह गई...

गई, वह गई, सोच
रहे होते, कि महसूसते
उसका भाई, ज़ोर-ज़ोर से, दीदी
दीदी, पुकारते, भोकार पार
रोने लगता

एक बार तो लगा
वह दिख ही नहीं रही
भाई हमसे, हम उससे, लिपट
गए, और अब तो हम भी, जगी
कैसी तो माया, लगे बिसूरने

कि कानों तक ले आई पछुआ
‘‘बाबू...बाबू रे, अब जा
जा...चल जा घरे...
अबेर...हो जाई...’’

और हमने देखा
कि वह तो बाँध पर खड़ी
दे रही आवाज़, हिलाते हाथ
आई, जान में जान, जान आई
तो लगा, कितनी, कितनी छोटी
नदी, यह नदी, और कितने
कितने लम्बे, उसके
हिलते हुए हाथ

मानो छू रहे हों...!


गाढ़ 

मैं बूँट की
रखवारी में, बाँध पर
बैठा था गम्हार तले, और
बह रही थी जो पुरवइया
गा रहा था फगुआ
कि अचानक देखता हूँ
गमछी बिछा, बेटू जो लेटी थी
जाने कब उठ बैठी, और क्या तो
सोचते-बूझते, सूझा कि लहकते
बधार में, तरास बुझाने को रखा था
जो घइला, ढक्कन उतार, जुगत
भिड़ा, पातर धार बना, गिरा रही
पानी, और देख-देख, खिल
रही, खिलखिला रही

‘‘अरे भाई, ई का...’’, मैं चिल्ला पड़ा
चिल्ला पड़ा, तो देखा, बेटू का रंग
भक्क से उड़ गया है, लेकिन मुझे
घूरते, अपने माथे पर दे मारा हाथ
और अकड़ते हुए उसने कहा
‘‘हद है, भाई, का बढ़िया
फगुआ गा रहे थे, लो
सब काम, बिगाड़ दिया न !
बिगाड़ दिया न, पापा !

अरे, मैं पानी
थोड़े न गिरा रही थी
ऊ तो ई देख रही थी
कि पानी बाँध से नीचे
एकदम नीचे

उतरता कैसे है !’’

०००

('निकट'...जनवरी-अप्रैल, 2016 में प्रकाशित...!)

Wednesday, February 17, 2016

केवाल
01
और क्या कहूँ कि...!

 --- कुमार वीरेन्द्र

आपकी इस कविता ने मुझे कई बातें याद दिला दीं...
पहली बात कि दुःख इस ब्रह्माण्ड में मनुष्य से पहले भी था, और यही अन्तिम सत्य है, मृत्यु से भी बड़ा सत्य, ऐसा क्यों, कुमार वीरेन्द्र...?

दूसरी बात कि दुःख वह नदी है, जिसका सृजन मनुष्य के साथ होकर भी जैसे पूर्णत: उसके बस की बात नहीं...क्यों, कुमार वीरेन्द्र...?

तीसरी बात...कि खड़े होने से पहले खड़ी होती हैं...तो वह हड्डियाँ हैं, जिन्हें हमने कभी अपने किनारों पर 'लगते' देखकर भी नहीं देखा...फिर क्या देखा, कुमार वीरेन्द्र...?

चौथी बात...कुमार वीरेन्द्र... कोई भी स्वप्न मरने की अपनी अन्तिम इच्छा के साथ क्यों पैदा होता है...?

पाँचवीं बात...सब समझ में आता है, तब भी लोग इतने कठिन  क्यों, कि जब तुम कई बार ख़ुद को ख़त्‍म करने के बारे में सोचते थे, तब तुम्हें एक बार एक बच्ची और एक बार एक कुत्ते के भौंकने की आवाज़ ने बचाया...?

...अब कोई बात नहीं...बस यही कि आजकल तुम क्या कर रहे हो, कुमार वीरेन्द्र, क्या वही, जो तुम करना चाहते हो...?

००० 

...और क्या कहूँ कि मेरे इस संग्रह की कविताएँ ऐसी नरक-यात्रा की कविताएँ, जिनसे आज भी छुटकारा नहीं मिला...इसलिए अपनी बहुत सारी रचनाओं को दोबारा पढ़ने की हिम्मत नहीं होती...!
आपने इस संग्रह के बहाने मुम्बई की झोपड़पट्टियों में नरक जी रहे जाने कितने उत्तरभारतीयों की जीवन-कविता लिखी है, जो अपनी संवेदना में इस पृथ्वी से भी बड़ी...!

(प्रणाम आपको...!
      सलाम...सबको...!)

०००

 

सरला माहेश्वरी

--- कविता
(कुमार वीरेन्द्र की कविताओं का संकलन 'विलाप नहीं' को पढ़ते हुए...)


करती नहीं विलाप !

सच कह रहे हो तुम
कुमार वीरेन्द्र !
जो नदी छूट गई है, उसके लिए विलाप नहीं
जो साथ में है, गहरा समुद्र, उसके खारेपन से जुड़ना है
जैसे नदी जुड़ती है समुद्र से
नदी तब भी ख़त्म नहीं होती


हज़ारों किलोमीटर दूर
गाँव की पगडंडियाँ
बहुत पीछे छूट जाती हैं
पर आँखों में बचे रहते हैं
...बाकी निशां...

जैसे मुंबई की उस
खोली की दीवाल पर
गहरे बहुत गहरे खुदे हुए
बिंदास दीवानों के निशाँ---आई लव यू
ज़िन्‍दगी से छूटकर भी
छूटे नहीं थे वो निशाँ

ज़िन्‍दगी की तस्वीरों को साथ लिए
किसी दिवाल, किसी घर की तलाश में
खोली-दर-खोली
टँगा रहता है
जैसे किसी ख़ाली छत की अलगनी पर
बच्चे का कुर्ता

मौसम की हर मार को सहता हुआ
अपनी चमक को खोता हुआ
करता रहता है इन्‍तज़ार
प्यार और विश्वास के दो हाथों का
उनकी ख़ुशी में चहकने का
पतंग की तरह, हवा में उड़ने का

लेकिन इस कुर्ते की ज़िन्‍दगी
पृथ्वी की ऐसी सन्‍तानों की है
जिन्हें रहने के लिए
देना पड़ता है भाड़ा
रोज़ जाता रहता है जिन्हें उजाड़ा

कभी म्युनिसपैलटी का बुलडोज़र
कभी खोली का मालिक
हज़ारों अनजाने भय के भूत
रहते हैं घेरे
सच ही तो कह रहे हो
तुम कुमार वीरेन्द्र !

मनुष्य से इतर संघर्षों में
लगे रहते हैं ये लोग
जैसे रातों को
सोने और जागने के बीच
ये तिलचट्टे मारते हैं
पति, पत्नी और बच्चे भी
जुट जाते हैं इसी काम में

इनके बच्चे
चूहों से भी डरते नहीं
वे तो इन चूहों से भी खिलौनों की तरह खेलते हैं
मकड़े, कनगोजर, केंचुएँ तक
यहाँ बेख़ौफ़ विचरण करते हैं
इनके पास नहीं होती
कोई मँहगी दवा इनसे मुक्ति की...
किसी ग़लती की तरह
बस उन्हें आता है इसका ख़याल

इनकी ज़िन्‍दगी का
हारमोनियम भी
धूल, मकड़ी और तिलचट्टों की
सरगम बन गया है
इसी सरगम में बजता है
एक पत्नी और एक बच्ची का दर्द

दिल फ़रेब ग़म की तरह
छलक उठता है
एक बाप
जो इस बच्ची का पिता है
एक पति
उस माँ का जिसकी यह बच्ची है

सही है तुम्हारा सवाल
कुमार वीरेन्द्र !
नर्क में क्यों बेची जाती हैं या बिकने को आ जाती है
दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत चीज़ें
फ़ुटपाथ पर क्यों बिकता है
हापुस आम

कि
जिसके सौन्दर्य को निहारता हुआ
जिसकी महक को अपने अन्‍दर
तक भरता हुआ
एक मजबूर पिता और पति
अपनी जेब में
दो केले भरकर
चित्र : राजकुमार
ख़ुद आलू की बोरी की तरह
लद जाता है किसी लोकल ट्रेन में

ज़िन्‍दगी की गाड़ी
जैसे
फ़ुलस्टाप से पहले
किसी कोमा की प्रकिया में
इसी तरह...
जाने कब तक...

चलती रहती है, लड़ती रहती है...!

०००