Wednesday, February 17, 2016

केवाल
01
और क्या कहूँ कि...!

 --- कुमार वीरेन्द्र

आपकी इस कविता ने मुझे कई बातें याद दिला दीं...
पहली बात कि दुःख इस ब्रह्माण्ड में मनुष्य से पहले भी था, और यही अन्तिम सत्य है, मृत्यु से भी बड़ा सत्य, ऐसा क्यों, कुमार वीरेन्द्र...?

दूसरी बात कि दुःख वह नदी है, जिसका सृजन मनुष्य के साथ होकर भी जैसे पूर्णत: उसके बस की बात नहीं...क्यों, कुमार वीरेन्द्र...?

तीसरी बात...कि खड़े होने से पहले खड़ी होती हैं...तो वह हड्डियाँ हैं, जिन्हें हमने कभी अपने किनारों पर 'लगते' देखकर भी नहीं देखा...फिर क्या देखा, कुमार वीरेन्द्र...?

चौथी बात...कुमार वीरेन्द्र... कोई भी स्वप्न मरने की अपनी अन्तिम इच्छा के साथ क्यों पैदा होता है...?

पाँचवीं बात...सब समझ में आता है, तब भी लोग इतने कठिन  क्यों, कि जब तुम कई बार ख़ुद को ख़त्‍म करने के बारे में सोचते थे, तब तुम्हें एक बार एक बच्ची और एक बार एक कुत्ते के भौंकने की आवाज़ ने बचाया...?

...अब कोई बात नहीं...बस यही कि आजकल तुम क्या कर रहे हो, कुमार वीरेन्द्र, क्या वही, जो तुम करना चाहते हो...?

००० 

...और क्या कहूँ कि मेरे इस संग्रह की कविताएँ ऐसी नरक-यात्रा की कविताएँ, जिनसे आज भी छुटकारा नहीं मिला...इसलिए अपनी बहुत सारी रचनाओं को दोबारा पढ़ने की हिम्मत नहीं होती...!
आपने इस संग्रह के बहाने मुम्बई की झोपड़पट्टियों में नरक जी रहे जाने कितने उत्तरभारतीयों की जीवन-कविता लिखी है, जो अपनी संवेदना में इस पृथ्वी से भी बड़ी...!

(प्रणाम आपको...!
      सलाम...सबको...!)

०००

 

सरला माहेश्वरी

--- कविता
(कुमार वीरेन्द्र की कविताओं का संकलन 'विलाप नहीं' को पढ़ते हुए...)


करती नहीं विलाप !

सच कह रहे हो तुम
कुमार वीरेन्द्र !
जो नदी छूट गई है, उसके लिए विलाप नहीं
जो साथ में है, गहरा समुद्र, उसके खारेपन से जुड़ना है
जैसे नदी जुड़ती है समुद्र से
नदी तब भी ख़त्म नहीं होती


हज़ारों किलोमीटर दूर
गाँव की पगडंडियाँ
बहुत पीछे छूट जाती हैं
पर आँखों में बचे रहते हैं
...बाकी निशां...

जैसे मुंबई की उस
खोली की दीवाल पर
गहरे बहुत गहरे खुदे हुए
बिंदास दीवानों के निशाँ---आई लव यू
ज़िन्‍दगी से छूटकर भी
छूटे नहीं थे वो निशाँ

ज़िन्‍दगी की तस्वीरों को साथ लिए
किसी दिवाल, किसी घर की तलाश में
खोली-दर-खोली
टँगा रहता है
जैसे किसी ख़ाली छत की अलगनी पर
बच्चे का कुर्ता

मौसम की हर मार को सहता हुआ
अपनी चमक को खोता हुआ
करता रहता है इन्‍तज़ार
प्यार और विश्वास के दो हाथों का
उनकी ख़ुशी में चहकने का
पतंग की तरह, हवा में उड़ने का

लेकिन इस कुर्ते की ज़िन्‍दगी
पृथ्वी की ऐसी सन्‍तानों की है
जिन्हें रहने के लिए
देना पड़ता है भाड़ा
रोज़ जाता रहता है जिन्हें उजाड़ा

कभी म्युनिसपैलटी का बुलडोज़र
कभी खोली का मालिक
हज़ारों अनजाने भय के भूत
रहते हैं घेरे
सच ही तो कह रहे हो
तुम कुमार वीरेन्द्र !

मनुष्य से इतर संघर्षों में
लगे रहते हैं ये लोग
जैसे रातों को
सोने और जागने के बीच
ये तिलचट्टे मारते हैं
पति, पत्नी और बच्चे भी
जुट जाते हैं इसी काम में

इनके बच्चे
चूहों से भी डरते नहीं
वे तो इन चूहों से भी खिलौनों की तरह खेलते हैं
मकड़े, कनगोजर, केंचुएँ तक
यहाँ बेख़ौफ़ विचरण करते हैं
इनके पास नहीं होती
कोई मँहगी दवा इनसे मुक्ति की...
किसी ग़लती की तरह
बस उन्हें आता है इसका ख़याल

इनकी ज़िन्‍दगी का
हारमोनियम भी
धूल, मकड़ी और तिलचट्टों की
सरगम बन गया है
इसी सरगम में बजता है
एक पत्नी और एक बच्ची का दर्द

दिल फ़रेब ग़म की तरह
छलक उठता है
एक बाप
जो इस बच्ची का पिता है
एक पति
उस माँ का जिसकी यह बच्ची है

सही है तुम्हारा सवाल
कुमार वीरेन्द्र !
नर्क में क्यों बेची जाती हैं या बिकने को आ जाती है
दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत चीज़ें
फ़ुटपाथ पर क्यों बिकता है
हापुस आम

कि
जिसके सौन्दर्य को निहारता हुआ
जिसकी महक को अपने अन्‍दर
तक भरता हुआ
एक मजबूर पिता और पति
अपनी जेब में
दो केले भरकर
चित्र : राजकुमार
ख़ुद आलू की बोरी की तरह
लद जाता है किसी लोकल ट्रेन में

ज़िन्‍दगी की गाड़ी
जैसे
फ़ुलस्टाप से पहले
किसी कोमा की प्रकिया में
इसी तरह...
जाने कब तक...

चलती रहती है, लड़ती रहती है...!

०००

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