Thursday, January 28, 2016

मरघट 

*

कुमार वीरेन्द्र 


...तुम...या अँधेरा...!



तुम गए, प्रकाश...!

लेकिन इस तरह कि शून्य में साथ, सिर्फ़ सन्नाटा ...अन्दर, बाहर...सन्नाटा ही सन्नाटा...!

आज 2 दिन बाद फ़िलहाल कुछ सोच पा रहा हूँ तो बस यही...और इतना ही...

कि...

1996 में तुम क्या थे मेरे लिए, बस एक अनजान मित्र, जिसे सिर्फ़ चिट्ठियों से जानता था...लेकिन ऐसा रिश्ता बन गया था, जैसे युगों से जानते हों एक-दूसरे को...! ...यह तुम थे, प्रकाश...कि मिलने के लिए पहली बार, अकेले, एक लम्बी यात्रा की, बग़ैर यह सोचे कि ढूँढ़ पाऊँगा भी कि नहीं...और तुम मिले भी दिन-भर भटकने के बाद बंगाल के चौबीस परगना के एक बिखरे घर के एक कमरे में, तो पहली बार जाना, कि इस पृथ्वी पर ज़िन्दा लाशें कहाँ-कहाँ नहीं, ये तो हर जगह, जिनके सपनों का तो पता नहीं, पर उन्हें अपने दुःस्वप्नों के साथ जीते, बिना आँखों के भी देखा जा सकता है...!

...तुम्हारे जीवन, घर, परिवार के 'मरघट' देखने के बाद एक जो लड़ाई ठानी हमने कि तुम जिओगे, पढ़ोगे, लिखोगे और  (...ताकि तुम्हारा ध्यान तुम्हारी बीमारियों से बाहर सृजन में लगा रहे...) ...रचोगे वह, जिसे कोई और नहीं रच सकता...उसे रचते-रचते यह क्या कर बैठे, प्रकाश...यह क्या...जबकि कोई भी बात, किसी के भी बारे में, कभी भी,  मुझसे नहीं छुपाई, और हो निर्णय कोई भी, एक बार कैसे भी मेरे कान में ज़रूर डाल देते...फिर ऐसा क्या था, जो मुझसे क्या, किसी से भी नहीं बताया जा सकता था (...कि तुम्हें चाहने वाले अब तो एक मैं ही नहीं, और भी कई...) ...ऐसा क्यों कर बैठे, समझ नहीं पा रहा...तुम जिन्हें प्रिय थे, और रहोगे, वे भी नहीं समझ पा रहे, प्रकाश...!

"मैं अक्सर कहता, प्रकाश, दुनिया में ऐसी कोई भी लड़ाई नहीं, जो जीती न जा सके...!" ...लेकिन अब तो मैं ग़लत साबित हो गया न, यार...हिला दिया तुमने जड़-समेत...जान गया कि लड़ाई हारी भी जाती है...लेकिन इस तरह...नहीं समझ पा रहा, दोस्त...नहीं समझ पा रहा, मेरे भाई...वर्षों का संघर्ष एक झटके में जाने किस 'अर्थ' में बदल दिया तुमने...कि जिधर देखूँ, उधर...तुम ही तुम, या अँधेरा ही अँधेरा दिखाई दे रहा...!

...हिम्मत टूट चुकी है, प्रकाश...अब डर लगने लगा है किसी को अपना कहने से, किसी को ख़ुद से ज़्यादा अपना मानने से...कि अब और सदमा नहीं झेल सकता...!

...अब तो यही चिन्ता, तुम्हारे गुनहगारों के हाथों न लगें, तुम्हारी वो रचनाएँ, जिनसे हमारे समय के जटिल यथार्थ को एक भिन्न नज़रिए से देखा-समझा जा सकता है...!

...प्रकाश...प्र...का...श...!

सुनो, सुन सकते हो, क्या यार, तुमने ये क्या...!

०००

तुमने 
एक दिन ठीक 
ही, कहा था 
चित्रकार  : राजकुमार 

ठीक ही, मित्र 

कि दुःख के 
पाँव भी 
होते हैं 

और 

पंख भी...!

***

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