Thursday, January 28, 2016

मरघट 

*

कुमार वीरेन्द्र 


...तुम...या अँधेरा...!



तुम गए, प्रकाश...!

लेकिन इस तरह कि शून्य में साथ, सिर्फ़ सन्नाटा ...अन्दर, बाहर...सन्नाटा ही सन्नाटा...!

आज 2 दिन बाद फ़िलहाल कुछ सोच पा रहा हूँ तो बस यही...और इतना ही...

कि...

1996 में तुम क्या थे मेरे लिए, बस एक अनजान मित्र, जिसे सिर्फ़ चिट्ठियों से जानता था...लेकिन ऐसा रिश्ता बन गया था, जैसे युगों से जानते हों एक-दूसरे को...! ...यह तुम थे, प्रकाश...कि मिलने के लिए पहली बार, अकेले, एक लम्बी यात्रा की, बग़ैर यह सोचे कि ढूँढ़ पाऊँगा भी कि नहीं...और तुम मिले भी दिन-भर भटकने के बाद बंगाल के चौबीस परगना के एक बिखरे घर के एक कमरे में, तो पहली बार जाना, कि इस पृथ्वी पर ज़िन्दा लाशें कहाँ-कहाँ नहीं, ये तो हर जगह, जिनके सपनों का तो पता नहीं, पर उन्हें अपने दुःस्वप्नों के साथ जीते, बिना आँखों के भी देखा जा सकता है...!

...तुम्हारे जीवन, घर, परिवार के 'मरघट' देखने के बाद एक जो लड़ाई ठानी हमने कि तुम जिओगे, पढ़ोगे, लिखोगे और  (...ताकि तुम्हारा ध्यान तुम्हारी बीमारियों से बाहर सृजन में लगा रहे...) ...रचोगे वह, जिसे कोई और नहीं रच सकता...उसे रचते-रचते यह क्या कर बैठे, प्रकाश...यह क्या...जबकि कोई भी बात, किसी के भी बारे में, कभी भी,  मुझसे नहीं छुपाई, और हो निर्णय कोई भी, एक बार कैसे भी मेरे कान में ज़रूर डाल देते...फिर ऐसा क्या था, जो मुझसे क्या, किसी से भी नहीं बताया जा सकता था (...कि तुम्हें चाहने वाले अब तो एक मैं ही नहीं, और भी कई...) ...ऐसा क्यों कर बैठे, समझ नहीं पा रहा...तुम जिन्हें प्रिय थे, और रहोगे, वे भी नहीं समझ पा रहे, प्रकाश...!

"मैं अक्सर कहता, प्रकाश, दुनिया में ऐसी कोई भी लड़ाई नहीं, जो जीती न जा सके...!" ...लेकिन अब तो मैं ग़लत साबित हो गया न, यार...हिला दिया तुमने जड़-समेत...जान गया कि लड़ाई हारी भी जाती है...लेकिन इस तरह...नहीं समझ पा रहा, दोस्त...नहीं समझ पा रहा, मेरे भाई...वर्षों का संघर्ष एक झटके में जाने किस 'अर्थ' में बदल दिया तुमने...कि जिधर देखूँ, उधर...तुम ही तुम, या अँधेरा ही अँधेरा दिखाई दे रहा...!

...हिम्मत टूट चुकी है, प्रकाश...अब डर लगने लगा है किसी को अपना कहने से, किसी को ख़ुद से ज़्यादा अपना मानने से...कि अब और सदमा नहीं झेल सकता...!

...अब तो यही चिन्ता, तुम्हारे गुनहगारों के हाथों न लगें, तुम्हारी वो रचनाएँ, जिनसे हमारे समय के जटिल यथार्थ को एक भिन्न नज़रिए से देखा-समझा जा सकता है...!

...प्रकाश...प्र...का...श...!

सुनो, सुन सकते हो, क्या यार, तुमने ये क्या...!

०००

तुमने 
एक दिन ठीक 
ही, कहा था 
चित्रकार  : राजकुमार 

ठीक ही, मित्र 

कि दुःख के 
पाँव भी 
होते हैं 

और 

पंख भी...!

***

Saturday, January 16, 2016

बाउबा...
और एक परिन्‍दा...!

कुमार वीरेन्द्र 
 




















अपनी बीड़ी 
*01*
 
मुँह को मुँह दिखाना 

एक पेड़ का अपराध है...कि वह पेड़ क्यों है !
एक पेड़ का अपराध है...कि वह फल क्यों देता है !
एक पेड़ का अपराध है...कि वह भले एक पेड़ रहे, और फल भी दे; लेकिन वह छाया क्यों देता है !

एक पेड़ का यह कैसा अपराध है...कि उससे कहा जा रहा...कि तुम्हारा एक पेड़ होना ही अपराध नहीं है...तुम्हारा फल देना...छाया देना ही अपराध नहीं है...तुम्हारा तो सबसे बड़ा अपराध है...ज़मीन पर खड़ा होना...और उससे भी बड़ा अपराध है...जितना ज़मीन के ऊपर होना, उतना ही ज़मीन के भीतर !

अच्छा तो यह एक पेड़ बारिश में भीगता भी है...ओ-हो...यह तो मामूली अपराध, और सबसे बड़े अपराध के बाद---एक तरह का एक और अपराध है...एकदम ऐसा...कि इसको बख़्शना, ख़ुद को ही अपराधी साबित करना होगा ! ...कि यह एक, एक तरह का एक और अपराध ही नहीं...कि भला इसकी जुर्रत देखो...आँधी-तूफ़ान में भी न टूटने का, न धराशायी होने का डर...इसका मतलब कि यह ज़रूर, ज़रूर अपराधी है, अपराधी...इससे समाज में ख़तरा बढ़ सकता है, और कइयों के अपराधी होने का पागलपन सवार हो सकता है !

अरे, अरे-रे...ई देखो...ई तो, चिड़ियों का भी अड्डा जमा रखा है...वही तो, वही तो...चहचहा रहा है...इसलिए ऐसा करो...कि सोचो, अपराध से भी कोई बड़ा अपराध, 'ऊ का है जो हो सकता है?' ...इस अपराधी को वही दंड दिया जाना चाहिए नहीं, बल्कि दिया जाएगा...नहीं तो ज़माना क्या कहेगा, आनेवाली पीढ़ियाँ क्या कहेंगी...सोचो, जल्दी सोचो कि वक़्त नहीं है, और मामला नाज़ुक !

नहीं सोचोगे तो कम-से-कम इतना करो कि सोचनेवालों को बुला लाओ, और सुनो, जो छूट जाएँ आने से, उनसे कहके नहीं, हिदायत देके आना...कि तुम जो छूट रहे हो, यह भी एक क़िस्म का अपराध है, और इसकी सज़ा...अपराध से भी बड़ा, 'ऊ का है जो हो सकता है?' ...चलो जो हो, पेड़ की तरह तुम्हें भी दी जाएगी !

क्या कहें, दिमाग़ ख़राब कर दिया है इस पेड़ ने...सुना है कि सपने भी देखता है...अब लो, अब क्या करें इसका भाई, भला कहीं पेड़ भी सपने देखता है...ई पेड़ के कुकर्म ने तो अपराध-पर-अपराध बढ़ा दिया है...ऐसा हो गया है कि इसको दंड न दिया गया, तो पूरी पृथ्वी ही ख़तरे में पड़ जाएगी, पड़ जाएगी रे भाई !

देखो, देख रहे हो न, मामला संगीन से भी संगीन हो रहा, अरे हो क्या रहा, हो चुका भइया...ऊपर से आफ़त यह कि जब पृथ्वी का मामला है, और वह भी एक पेड़ के कारण, तो सोचो कि इस अपराध की सज़ा, 'पृथ्वी से हल्की' होगी, तो हम कौन मुँह लेकर, 'मुँह को मुँह' दिखाएँगे !

इस पेड़ का क्या करें आख़िर...अरे धत्त, तेरी तो 'आख़िर'...यहाँ अपराध-पर-अपराध गिना न जा रहा, और ई दिमाग़ है कि ख़रबूज़ा रे...'आख़िर' पे आके अटका है...अरे धत्त, धत्त, तेरी तो 'आख़िर' !
यह 'आख़िर' भी लगता है इस, इस पेड़वे का ही साथ दे रहा, जो अपने तो हिल न रहा, हिला रहा...अब तो एक ही उपाय है कि इसको ख़ुद भी काटते हैं और लोगों से कटवाते भी हैं...लेकिन फिर ई कैसे तय होगा...कि किस अपराध की सज़ा दी गई, और किस अपराध की रह गई...कवनो बात नाहीं काटने के बाद सोच लेंगे, सोचने से न फरियाएगा तो तय कर लेंगे, और तय करने से ना फरियाएगा तो इसमें क्या है, फिर सोच लेंगे...कि अपराध से भी बड़ा अपराध, 'ऊ का है जो हो सकता है?'

अरे, 'ऊ का है हो, ऊ...ऊ...ऊ...???'
अरे बताओ ना, बताओ-बताओ, अरे बताओ रे...गुप्तचरो, सलाहकारो, सन्तरियो, मंत्रियो...और पेनी-बेपेनी के लोटो...बताओ-बताओ कि इस एक पेड़ जैसे अपराधी के ख़िलाफ़ न्याय करने का मामला है !

न्याय करने का मामला, न्याय करने का सियारो, हे ग्रहो-ग्रहों के ग्रहो, बताओ, बताओ कि इस अपराधी की सज़ा, इस पृथ्वी के लिए इस 'पृथ्वी से हल्की' नहीं होनी चाहिए...!

●o●


अपनी बीड़ी 
*02*

जीवित रहा जा सकता है, जिया नहीं जा सकता...

(आज सुबह फ़ोन पर किसी से बात करते कुछ ऐसा सुनने में आया कि दिन-भर मन एकान्त ढूँढ़ता रहा...! ढूँढ़ता रहा एकान्त में...अपने उस मित्र को, जिसने कभी कुछ कहा था...!)

क्या तुमने ऐसा कोई आदमी देखा है, जिसके पास सिर्फ़ मुँह हो ?
देखा है ऐसा आदमी, जिसके पास सिर्फ़ भुजाएँ हों ?
या देखा है क्या, ऐसा आदमी, जो मुँह और भुजाओं वाला हो; सिर्फ़ मुँह और भुजाओं वाला ?

बोलो...कुमार वीरेन्द्र...देखा है क्या तुमने ?

देखा है क्या, ऐसा आदमी, जिसके पास न मुँह हो, न भुजाएँ...जाँघें हों, हाँ सिर्फ़ जाँघें ?
या तुमने या किसी ने, ऐसा आदमी, देखा है...जो सिर्फ़, सिर्फ़--पैरों वाला हो; पैर ही हों जिसके पास ?

सिर्फ़ सुनना ही जानते हो कि कुछ बोलना भी ? अगर कुछ बोलना जानते हो, आता है कुछ कहना, तो बताओ, कुमार वीरेन्द्र, देखा है कभी ? देखा है कहीं?

मैं क्या बोलूँ, बाउबा !...क्या बोलूँ, कि तुम्हारे हर सवाल के साथ...जवाब भी है ! कि मेरी तरह तुम भी तो इसी धरती के हो...कि जब तुमने नहीं देखा, फिर मैं किन आँखों से देखता ! मिलता देखने को कहीं...ऐसा आदमी !

जब नहीं देखा, तो ये बताओ कि क्या हम इस धरती के आज भी ग़ुलाम हैं ? अरे, इतनी मज़दूरी में नहीं भरेगा पेट तो कैसे काटें खेत (फ़सल) ? न काटें तो हमारी माँ-बहनों को भी 'यहाँ...वहाँ' लाठी कोंचने, गोली मारने की धमकी ! ऊपर से बात-बात पर हमारी 'जाति' बता, हमारी औक़ात बताई जाती है ! क्या जाति आदमी की औक़ात हो सकती है ? होनी चाहिए ?

बोलो, कुमार वीरेन्द्र, तुम क्या सोचते हो ?

...मैं अलग से क्या बोलूँ, सोचूँ, बाउबा ? तुम तो मुझसे ज़्यादा पढ़ते हो ! सिर्फ़ किताबें ही नहीं, आदमी और उसके समय, समाज को ! तुम तो ख़ुद ही जानते हो बाउबा, कि शास्त्रों को धूर्तों ने अपने शातिर नज़रिए से रचा, फिर शासकों ने...जिन्हें समय-समय पर जिसने पहचाना...नकारा, धिक्कारा, और संघर्ष भी किया...! उस संघर्ष का रास्ता अभी और, और लम्बा है, बाउबा !

कुमार वीरेन्द्र, सोचो, सोचो कि मुँह, भुजाएँ और जाँघ एक 'देह' के 'अंग' हैं, उसी देह के पैर भी हैं अंग ! फिर एक ही देह के अंग मुँह, भुजाएँ और जाँघ...जब अछूत नहीं हो सकते, तब उसी देह के पाँव अछूत कैसे हो सकते हैं ?...कैसे हो सकते हैं हर 'दमन' के लिए अभिशप्त ?

अरे ज़मीन से गिनो, तो देह के अंगों में सबसे पहले आते हैं पाँव ! अरे ऊपर से गिनो, तो सबसे पहले वे अंग नहीं आते, जिनसे पैदा होनेवालों को बताया जाता है श्रेष्ठता के प्रतीक !

क्यों, कुमार वीरेन्द्र, क्या मैं ग़लत हूँ ?

बाउबा, तुम्हारी पीड़ा, उस मनुष्य की पीड़ा है, जिसके लिए यह धरती, 'धरती' बनी है ! तुम सिर्फ़ मेरे मित्र नहीं हो ! अगर तुम सिर्फ़ मित्र होते तो और बात थी...! और बात...!

बाउबा, तुम तो मेरा वो आत्म-विश्वास हो, हो वो मक़सद, जिनके बिना इस धरती पर इस समाज में जीवित तो रहा जा सकता है; जिया नहीं जा सकता !

नहीं जिया जा सकता, नहीं ही जिया जा सकता, मेरे मित्र, मेरे बाउबा !

न अपने लिए, न किसी के लिए !

●o●


अपनी बीड़ी 
*03*

ओ मेरे माँझी, मुझे कफ़न मत ओढ़ाना... 

रात इतनी अँधेरी थी, इतनी, कि मुझे एक जुगनू पर भरोसा करना पड़ा...ठोकरें लगती रहीं और गिरता रहा, क्या करता, मुझे ठोकरों पर भरोसा करना पड़ा...ढंड और कुहासे में घिरा था इस तरह कि कउड़े की लहकती आग ही बचा सकती थी, लेकिन उस सूखे गड्ढे पर भरोसा करना पड़ा, जिसमें ख़ुद को गठरी-सा समेट सकता था...ऐसे में भला नींद क्या आती, बातें करनी थीं तो साथ खरोंचें और ज़ख़्म थे, उन पर ही भरोसा करना पड़ा...!

सुबह हुई, लेकिन उस पर भरोसा करके भी क्या कर लेता, अंतड़ियाँ दो कौर माँग रही थीं, और दो कौर के नाम पर हवा थी, मुझे हवा पर भरोसा करना पड़ा...एक घूँट कहीं से पानी मिल जाता, पर कैसे मिलता एक घूँट कि पानी के नाम पर ओस थी, मुझे उसी पर भरोसा करना पड़ा...अब मुझे किसी कन्धे की ज़रूरत थी कि पाँव चलने की क़ूवत जितना चुकाना था, चुका चुके थे...इसलिए अपने ग़ुस्से पर भरोसा करना पड़ा, बार-बार गरियाता रहा ख़ुद को कि रुको मत, रुको मत...!

न कहीं कोई घर, न कहीं कोई पेड़, कहीं कोई राह भी नहीं, जिधर चलता, बनती उधर ही राह, ऐसे में इस धरती पर भरोसा करना पड़ा, कहीं तो ले जाएगी...और देखो कि कहीं ले भी गई तो वह जगह 'मुरघटिया' थी, 'दियारे' के उस बियाबान में गंगा के किनारे 'मुरघटिया', जहाँ पानी मिला, और मिली उम्मीद आग की, मिली उम्मीद तो मैं क्या करता, ख़ून जम रहा था, दिखी एक माचिस, जिसे देखते ही समझ गया, क्यों छूट गई है, कि जिसके साथ आई, वह आदमी भले ही कितना भी प्यारा रहा हो, कितना भी अच्छा इंसान, लेकिन उसके 'अन्त' में उसके बिना कोई योगदान, योगदान न होता...तब भी सब घर गए, वही वापस न जा सकी, जो भी हो, मुझे तो उसी, उसी माचिस पर भरोसा करना पड़ा...!

अब जब बड़ी तजुरत के बाद आग जली, तो दूर अधजली लाशों में उलझे 'मुरघटिया' के कुकुर भूँकने-भौंकने लगे, कुकुरों की आवाज़ सुनी तो याद आया घर, याद आया पर-परिवार, बच्चे याद आए, जिनके लिए, जेब टटोली, तो लेमनचूस पड़े मिले...फिर तो आँखों से छलक आए आँसू, पता नहीं अब तक कहाँ थे, आख़िर इस 'मुरघटिया' से पहले छलककर भी क्या करते, कहाँ पता था कि यहाँ तक पहुँच ही आएँगे...यह ज़िन्दगी भी क्या चीज़ है, कि जहाँ इस 'मुरघटिया' पर जीवन से मोहभंग होना चाहिए, छलक रहे, आँसू छलक रहे...और 'मुरघटिया' ही सही, यादें साथ थीं, तो अपने होने को जीने और जीने को होने पर भरोसा करना पड़ा...!

''कैसे कुल्हाड़ी से वो भी कटते,
जब दरख़्तों की छाल में थे हम !''

जब कौंधने लगे रिश्ते, तो यादों में कोई और भी कौंधने लगा, अपना दोस्त ग़रीबा, ग़रीबा जिसका यह शेर याद क्या आता, खरोंचों में उलझ-उलझ जाता, ज़ख़्मों में ठहर-ठहर जाता...सच, कुमार वीरेन्द्र, मुझे किताबों ने नहीं, इस ज़िन्दगी ने सिखा दिया है...इस ज़िन्दगी ने कि किसी आदमी पर इस तरह भरोसा मत करो कि एक दिन आदमी और आदमियत से ही भरोसा उठ जाए...!

मैं समझ सकता हूँ, बाउबा, समझ सकता हूँ, लेकिन तुमने कभी यह भी तो कहा था...ज़िन्दगी को एक ज़िद की तरह जियो, और जियो तो मृत्यु को भी एक ज़िद की तरह ही...एक ज़िद की ही तरह...?

कहा था, और आज भी अपने कहे हुए पर क़ायम हूँ, मेरे भाई, तभी तो देखो कि देखने के भीतर खंड-खंड होते देख रहा 'काल', खंड-खंड होते...फिर भी ख़ुद से बग़ैर कोई शिकायत किए भरोसा करने निकला हूँ, निकला ही हूँ एक बार फिर भरोसा करने, आदमी पर...आदमी पर ही, कुमार वीरेन्द्र...!

...और सुनो, कुमार वीरेन्द्र, सुनो, कर सको तो एक काम करना, कि अबकी बार भरोसे में अगर मारा जाऊँ, तो मेरे मित्र--मेरे साथी--मेरे भाई, बस एक काम, मुझे कोई कफ़न मत ओढ़ाना या ओढ़ाने देना, कि तब बेकफ़न जाना ही मेरी अन्तिम इच्छा मानना, देखना, देखना मेरे प्यारे, ऐसा ही हो...!

अन्तिम इच्छा...बेकफ़न...बेवतन...जाना, अपनी धरती पर अपनी धरती से; हाँ, कुमार वीरेन्द्र...देखना, देखना मेरे दोस्त, अपमान न हो...यह अपमान...!

...और सुनो, सुनो मेरे माँझी, ओ मेरे माँझी, मेरे बाद मेरे बारे में अगर कुछ याद रखना चाहो, तो बस यही, यही एक बात याद रखना, यही एक...कि कोई था तुम्हारा, जिसे तुम्हारे सवालों की तरह हज़ारों सवाल हज़ारों, प्रिय, बेहद प्रिय थे, बिल्कुल उसकी अपनी अन्तिम इच्छा की तरह...!

अन्तिम इच्छा की तरह...!

हाँ, मेरे दोस्त...हाँ, मेरे माँझी, रख सको याद तो रखना, वास्ता बस इतना ही, इतना ही कि कोई था, जिसे सवाल बहुत प्रिय तो थे...पर पता नहीं...एक आदमी था, कि कोई एक परिन्दा...!

●o●


अपनी बीड़ी 
*04*

और क्या कहूँ कि कह सकूँ और... 

उससे पूछा गया...तुम्हारा नाम क्या है ? ...उसने जो बताया, उस पर विश्वास नहीं किया गया...!
उससे पूछा गया...तुम्हारी जाति क्या है ? ...उसने जो बताया, उस पर विश्वास नहीं किया गया...!
उससे पूछा गया...तुम्हारा धर्म क्या है ? ...उसने जो बताया, उस पर विश्वास नहीं किया गया...!
उससे पूछा गया...तुम्हारे माँ-बाप कौन हैं, कहाँ रहते हैं, क्या करते हैं ? ...उसने जो बताया, उस पर विश्वास नहीं किया गया...!
उससे पूछा गया...तुम किनको अपना दोस्त मानते हो और किनको अपना दुश्मन ? ...उसने जो बताया, उस पर विश्वास नहीं किया गया...!

उससे पूछा गया...तुम्हारी अपनी ज़मीन है, तो उसके बारे में बताओ ? आसमान है, तो उसके बारे में, और टिमटिमाते तारों के बारे में भी ? पूछा गया कि तुम्हारा अपना कोई चाँद है, या सूरज, तो उसके बारे में बताओ ? ...फिर दिन और रात के बारे में भी ? फिर पूछा गया...किसी को पुकारने और किसी को भी न पुकारने के बारे में...! ...और फिर इस तरह की पुकार के बारे में भी, जो पुकारने और न पुकारने जैसी लगे...कि बताओ, बताओ...? उससे पूछा गया...अँधेरे में गिरने-उठने, गिरकर न उठने--उठकर न गिरने के बारे में...फिर ऐसे में किस दिशा की ओर जाना बेहतर होगा, और किस दिशा की ओर नहीं...और जाना किसी दिशा की ओर ही चाहिए, तो क्यों...क्यों-क्यों ? ...पर...पर उसने...उसने जो बताया...उस पर विश्वास...नहीं...नहीं किया गया...!

उससे पूछा गया...इस धरती पर आज भी कुछ कुएँ बचे हैं, जिनके ऊपर भी सतह है, जिनके नीचे भी...ऊपर सपने हैं और नीचे नींद, तुम्हें रहना हो तो कहाँ रहना चाहोगे ? ...वैसे एक और जगह है...जहाँ नींद और सपनों के साथ जिया जा सकता है, लेकिन वहाँ मृत्यु बिन फड़फड़ाए निश्चित है, यानी अकाल मृत्यु...बताओ, कहाँ का चुनाव करना चाहोगे ? ...फिर पूछा गया कि यह पृथ्वी कल भी ख़ाली नहीं थी, आज भी ख़ाली नहीं दीवारों से, अगर तुम्हें दो दीवारों में फ़र्क़ करना हो, उनको लेकर कोई तर्क करना हो, तो क्या करोगे, क्या करोगे, जब एक दीवार की तरफ़ तुम्हारे अपने हों, और दूसरी दीवार की तरफ़ भी तुम्हारे अपने ? पूछा गया कि बताओ...यह जो दुनिया है, इसके लिए तुम हो कि यह तुम्हारे लिए है, और वह भी तब, जब लोग इस दुनिया में या तो रहते न हों, या रहकर भी न रहते हों, या रहने न रहने के बीच प्रतीक नहीं, बिम्ब हों...बिम्ब-ही-बिम्ब...ऐसे में तुम क्या कहना चाहते हो, क्या करना चाहोगे...जो तुम्हारे पक्ष में हो...हक़ में नहीं...और अगर हक़ में हो भी, तो न्याय की समाधि पर, जिसे अन्तिम माना भी जा सकता है, और नहीं भी...?
और देखिए, देखिए कि...उसने जो बताया या कहा या कह गया, उस पर...विश्वास नहीं किया गया, नहीं ही किया गया...विश्वास...!

उससे पूछा गया...तुम्हारे लिए अतीत क्या है, वर्तमान क्या है, और जिसे कहते हैं भविष्य, वह क्या है ? ...उसे बताना था, बताना ही था, बताया...! ...लेकिन, उसके बाद उससे यह कहते हुए फिर पूछा गया, कि इस बार तुम यह ध्यान में रखते हुए बताओ---अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में...कि तुम्हारा जवाब अगर सही होता है तो श्मशान के मुर्दों को फिर से ज़िन्दगी मिल सकती है, जिसमें तुम्हारे पुरखे भी होंगे...ऐसे में सोचो कि अतीत के साथ जो नाइंसाफ़ी हुई है, उसके एवज़ में इंसाफ़ मिल सकता है...सोचो कि वर्तमान, जो एक गणित की पहेली बना हुआ है, जो कि हमेशा बना रहता है, उसका हल पागल-से-पागल भी कर सकेगा...सोच सकते हो, सोचो कि भविष्य, जिसे आज तक कोई देख नहीं पाया, उसे न सिर्फ़ देखा जा सकेगा, बल्कि तुम्हारे माकूल जवाब के बाद, वह ख़ुद जिसे चाहे, उसे देख भी सकेगा...छू भी सकेगा...!
...और इस शब्द-दृश्य के बारे में...उसने जो कहा या बताया, या जो सुना गया...उस पर इस बार भी, पलक झपकने-भर ही सही...विश्वास...नहीं किया गया...नहीं...पलक झपकने-भर भी...!

अब इतना कुछ पूछने के बाद उससे पूछा गया...कि तुम्हीं बताओ, अब तुमसे क्या पूछा जाना चाहिए ? ...इस पर उसने जो कहा, उस पर कहा गया कि यह तो सोचने का मामला है, समय लगेगा ! उससे फिर कहा गया कि कुछ और बताओ, कुछ और...और उसने फिर जो कहा, उस पर कहा गया कि यह तो सोच से परे है, बहुत परे मामला, मामला भाई...वह युग अभी आया नहीं ! उससे फिर कहा गया कि देखो, अब जब तुम्हें ही बताना है कि क्या पूछा जाना चाहिए, तो तुम्हें ही बताना है, और बताओ ? ...कि 'बताना' भी एक कला है, जीवन है...और अद्भुत भी...अद्भुत ही...! ...और जैसाकि उसे बताना था, बताया, बताया ही, कि उससे क्या पूछा जाना चाहिए...! ...और तब उससे पूछा गया, समय को साधे...वही...वही सवाल...जिसके जवाब में...उसने जो बताया...दूर, बहुत दूर से, क्या-क्या तो लाँघते, क्या-क्या तो पार करते...दौड़ता हुआ आया...आया हाँफते-हाँफते विश्वास...और उसे, गले लगा लिया गया...भर-भर अँकवार, भरते...होते ओर-पोर, छोर-अछोर होते...!

फिर क्या हुआ ? ...?

फिर क्या हुआ...? ...बाउबा...?

...वही, जो तुम सोच रहे हो...या सोच पा रहे हो...या जो सोच सकते हो...!

...यानी...उसे...! ...उसे...मार...दिया...गया...! ...लेकिन वह तो एक व्यक्ति था, सिर्फ़ एक व्यक्ति...! ...एक व्यक्ति...बाउबा...!

...हाँ...लेकिन तुम...ये...

...तुम...ये क्या कह रहे हो, सोच रहे हो, कुमार वीरेन्द्र...वह एक व्यक्ति तो था, लेकिन उसे जीने की हज़ारों कलाएँ मालूम थीं और कलाओं के हज़ारों जीवन के ठिकाने भी पता थे...'गति' से क्या ख़ूब संगत थी उसकी...इसलिए...अतिरिक्त...अतिरिक्त निष्कर्ष मत निकालो...भटको मत...और विचलित होना भी ठीक नहीं...! ...कि कुमार वीरेन्द्र---ऐसी क्रियाएँ कहने-सुनने के 'पाठ' के लिए ज़्यादा बेहतर होती हैं, हो सकती हैं सूनापन या कोई शून्य रचने की संरचना या शिल्प के लिए---लेकिन ध्यान रखो कि काल जिबह-सवाल हो...ये क्रियाएँ अक्सर दम तोड़ देती हैं, जोखिम उठाओ तो अलग से जोखिम बन जाती हैं...इसलिए अतिरिक्त...अतिरिक्त न सोचो...मेरे, मेरे भाई...!

तो तुम कहना क्या चाहते हो ? ...और...'यह'...? ...'यह' सुनाया क्यों ? ...आख़िर 'यह' क्या...? ...क्या 'यह'...क्या बाउबा ?

...क्या कहूँ कि कह सकूँ और...और...और, कुमार वीरेन्द्र...मिले हो बहुत दिनों बाद...अगर कर सकते हो, तो बस इतनी कर दो मदद, इतनी...कि ख़ुद से आँख मिला सकूँ...! ...मिला सकूँ ख़ुद से...मिल सकें आँखें, आँखों से...आँखों से, कुमार वीरेन्द्र...जैसे मृत्यु मृग से, मृग मृत्यु से...!

...और मुझे...!

...मुझे आज भी याद है---याद है...अपने कन्धे पर एक मित्र का दरिया होना...दरिया में दरिया होना...हर तरफ़ पानी, पानी ही पानी...बीच में जैसे हम...हम, मानो तैरते नहीं, धँसे दो खम्भे...दो खम्भे ही...धँसे, धँसते जाते...धँसते...धँसते...जाने कहाँ...!

...याद है, तो याद है...!

...याद...जिनमें अँधेरा-ही-अँधेरा, जिनमें धुआँ-ही-धुआँ...और जिनमें, बाउबा के सवाल...वो सवाल, जो आज तक मेरे कानों में गूँजते रहते हैं...और कभी-कभी इस तरह, कि समझ नहीं पाता...जी चुका कि जी रहा, जी रहा कि जी चुका...कि जी ही चुका, जी चुका...!

गूँजते रहते हैं सवाल, वो सवाल...कि आख़िर वह कौन सी बात थी या हो सकती है, कुमार वीरेन्द्र...आख़िर उसने कहा क्या था, क्या कहा था...क्या कहा होगा...?

...बताओ, बताओ न, कुमार वीरेन्द्र...? ...कौन सी थी बात, वह बात...जो उससे पूछने के लिए उनके पास नहीं थी, नहीं थी उनके पास...थी उसके पास ही...थी उसके साथ ही...उसके पास ही, उसके साथ ही, कुमार वीरेन्द्र...पास ही--साथ ही, कि बन गई...बन गई उसकी संगत ही साहूकार...!

...उसकी संगत ही साहूकार, कुमार वीरेन्द्र...उसकी संगत ही साहूकार...!

●o●


अपनी बीड़ी 
*05*

न आदमी बन पाया, न एक बिजूका... 

तुम्हें लगा कि वो तमाशा कर रहा है...!
तुम्हें ये नहीं लगा कि भला वो क्या तमाशा कर सकता है, जो एक आदमी की तरह जीने की अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद...न तो आदमी बन पाया...और न ही एक बिजूका !

हाँ, एक आदमी, अपने घर-परिवार के लिए...!
हाँ, एक बिजूका, अपने खेतों के लिए...!

तुम्हें लगा कि वो कोई साज़िश कर रहा है...!
तुम्हें बदनाम करने की कोई साज़िश...!
तुम्हें ये नहीं लगा कि वो, भला क्या साज़िश कर सकता है, किसी को कर सकता है बदनाम...जो साज़िश का ख़ुद हो शिकार...अपने पुरखों-बुज़ुर्गों की तरह ! और आफ़त में आफ़त, कि बाढ़ हो, बेमौसम बारिश या हो सुखार...प्रकृति की भी ऐसी मार-पे-मार, न निकले कराह...अरे, आह तक नहीं !

सुनो, तुम नहीं समझ सकते एक किसान को...!
एक किसान को, जो क़र्ज़ में डूबा हो...! कि तुमने बाहर से देखा होगा, भीतर से नहीं, जहाँ वह रोज़ हज़ारों बार टूटता है, वह भी बिन आवाज़ ! ऐसे में जगना, सिर्फ़ जगते रहना उसके हक़ में...कि एक पल को आती भी नींद, उसे अपनी बिवाइयों के दर्द में झपकना पड़ता...और देखो, यह झपकना भी कैसा, कि चिड़ियों के जगने से पहले जग जाना होता...अपने खेतों के लिए...!

तुम नहीं समझ सकते कि क़र्ज़ में डूबे, तल तक, एक किसान से ग़ैर तो ग़ैर, अपने भी यूँ मुँह फेरते हैं...मानो वह इस जगत का कोई सबसे बड़ा गुनहगार...ऐसे में, घर जाए कि 'बन' में, कि कहाँ, समझ नहीं पाता...समझ नहीं पाता कि उसके किसान होने की सज़ा, ताउम्र मिले, क़बूल है; पर उसके बच्चों को क्यों मिल रही...जो कभी एक कौर अन्न...कभी एक चुटकी नमक के लिए भी तरसते...! ...ऐसे में उसे न तो नियति समझ में आती, और न ही नीतियाँ...!

तुम नहीं समझ सकते कि तुमने कभी खेती नहीं की ! ...और जब नहीं की...किसी किसान को मरते देख सकते हो...या मार सकते हो...! ...या मरते देखते हुए मार सकते हो...!

तुम कहते हो, उसे बचाया जा सकता था, कि यह काम पुलिस का था ! ...तब ये बताओ, तुम्हारा काम क्या था...मंच पर 'मंच' होना कि भाषण करते 'भाषण' होना ! और किसके लिए होना ये सब... जनता के लिए कि देश के लिए...जिसके लिए भी, पर वह अलग तो नहीं था ? ...अरे क्या समझ रखते हो, समझ नेताजी ! ... तुम्हें तो यही नहीं पता...'नेता' कहते किसे हैं ? ...अरे नेता तो उसे कहते हैं, जो हर सिपाही से आगे रहे...रहे आगे ख़ुद के भी आगे, ख़ुद के ही पीछे नहीं...!

समझ में नहीं आता कि इसे क्या कहें, क्या कहें कि एक किसान ने जहाँ आत्महत्या की, उस जगह को उस देश की राजधानी भी कहते हैं, जो अपने लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटने से नहीं चूकता...क्या कहें कि जहाँ घटी यह घटना, वहाँ एक सभा भी लगी थी...सभा, जिसमें इस सदी की ख़ातिर विकल्प के रूप में चुनी गई और अप्रत्याशित बहुमत हासिल करनेवाली पार्टी के नेता तो थे ही, पत्रकार भी थे; था एक बड़ा जन-समूह भी !

क्या कहें...कि हद है हद---हद, कि कुछ ही दूरी, बस कुछ ही दूरी पर संसद में संसद को 'चौपाल' बनानेवाले...वे भी थे---जिनके बिना यह देश न तो विकास के रास्ते पर आगे जा सकता है...और न ही 'धर्म' के रास्ते पर...!

...तो 'कर्म' का क्या हुआ...ये कहाँ गया, बाउबा...ग़ैरज़रूरी हो गया क्या...कि कोई और मतलब हो गया इसका...कि किसी और अर्थ में जाना जाता है अब...?

मन करता है कि वाह-वाह करूँ, और ज़ोर-ज़ोर से; लेकिन क्या करूँ कि निकलती है आह; और वह भी इस तरह कि ख़ुद को ही न दे रही सुनाई...!

ऐसे में तुम्हारी बहुत याद आ रही, बाउबा ! ...बहुत याद...! ...कि तुमने एक बार ठीक ही कहा था...'नागरिक' बने रहने या बनाए रखने में एक बहुत बड़ा भ्रम छिपा होता है, कुमार वीरेन्द्र...एक बहुत बड़ा भ्रम ! इसलिए बन सकते हो तो एक मनुष्य बनो, एक नागरिक नहीं...!

हाँ, बाउबा, तुमने ठीक ही कहा था...बहुत याद आ रही तुम्हारी...कि बाउबा...वहाँ, हाँ वहाँ...जहाँ एक किसान ने आत्महत्या की, सब-के-सब नागरिक ही तो थे...नागरिक...हाँ नागरिक ही...कि सब-के-सब देखते रहे, सुनते रहे---और उसने कर ली अपनी हत्या...!

कहा था तुमने...! ...तो सोचता हूँ, कितना सच कहा था---कि लोकतंत्र नागरिकों का नहीं, मनुष्यों का हो, तभी मानव-प्रजाति ही नहीं, यह पृथ्वी भी सुरक्षित रह सकती है...रह सकती है तभी, तभी सुरक्षित...!

कहा था, कहा था तुमने...तो सोचता हूँ, सच, कितना सच कहा था कि आज झूठ कुछ भी नहीं लग रहा...न मानव-प्रजाति लग रही...न यह पृथ्वी !

हाँ बाउबा, यह पृथ्वी, यह पृथ्वी भी...!
कितनी...कितनी असुरक्षित...!

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