Tuesday, March 21, 2017


Chitra : Kumar Virendra






बस यूँ ही…तीन साल पहले लिखी गई, युवा साथी सुनील श्रीवास्तव की यह कविता ‘जनराह ब्लॉग’ पर दिख गई तो सोचा कि साझा कर लूँ…बस साझा…!









तमीज़
(कुमार वीरेन्द्र के प्रति)

गमछिया रख दो न वीरेन्द्र भाई
क्या रखा है इस लाल गमछी में
जो हमेशा गले लगाए फिरते हो
तुम तो पहचानते हो इस समय को
यह अपनी ज़रूरतों को
तरजीह देने का समय नहीं है
उनकी संहिताओं को मानने का समय है
वे विश्वास नहीं करेंगे
किसी में आज भी बची है क़ूवत
कि अपने रंग में रँगा
घूमता है उनकी दुनिया में
तुम भूल गए क्या
राजधानी का वह दफ़्तर
चपरासी ने उतरवा लिया था गमछा
भीतर भेजने से पहले
तुम पूछ भी तो नहीं पाए थे
उस आई.ए.एस. अधिकारी से
कि साहब क्यों कर दिया जाता है नंगा
हमें आपसे मिलने से पहले
दूर क्यों जाएँ
वह हमारे प्रतिनिधियों की सभा थी
चुने हुए प्रतिनिधियों की सभा
गेट पास था तुम्हारे पास
फिर क्यों शक हुआ प्रहरियों को
सुरक्षा के दुश्मन
गमछी लटकाकर ही आते हैं क्या
मैं ही क्या कहूँ
मेरी गली के कुत्ते भी तो
भौंकने लगे थे उस दिन
तुम्हारे गले में गमछी देखकर
ख़तरनाक समय है वीरेन्द्र भाई
कुत्ते भी सीख गए हैं
आदमी की तमीज़
गमछिया उतार दो भाई
गुज़रने नहीं दिया जाएगा वरना
तुम्हें किसी गली से...!

००

Tuesday, March 7, 2017




'रू' की राह में...!

जब मित्र पूछते कि क्या आपकी पत्रिका---'रू'-क़लम की ज़मीन---बन्द हो गई...या उसका अंक अब कब आनेवाला है...?
ऐसे में मैं अक्सर चाहकर भी किसी से ठीक-ठीक कुछ कह नहीं पाता था...कि मेरे लिए अपना लेखन हो या सम्पादन, अपनी शर्तों पर जीने-मरने के प्रश्नों से जुड़ा रहा है...यही कारण कि वह 'रू' का प्रवेशांक, जो 'आज का हिन्दी साहित्य और गाँव का यथार्थ' विषय पर केन्द्रित (पृष्ठ--250) हो...या असमिया कवयित्री मणिकुंतला भट्टाचार्य और मैथिली कवि तारानंद वियोगी पर केन्द्रित कविता-पुस्तिकाएँ... या 'नक्सलवाद और हिन्‍दी साहित्‍य' पर केन्द्रित वह अंक, जिसे काफ़ी बृहद् होने के कारण अन्ततः अभाव में नहीं ही निकाल पाया (...जिससे कुछ लेखक कुछ दिनों के लिए नाराज़ भी रहे...) और सामग्रियाँ जाने कहाँ-कहाँ बिखर गईं... सच, यह सब मेरे जीने-मरने का ही हिस्सा...!
...क्या कहूँ कि इन दिनों एक छटपटाहट-सी...कि क्यों न 'रू' को फिर से शुरू किया जाए...क्यों न एक लड़ाई और लड़ी जाए...!
उम्मीद...और संघर्ष...की राह में...'रू' के पहले अंक (जनवरी, 2011) का यह कवर, जो मुझे आज भी प्रिय...बहुत प्रिय...बहुत-बहुत, साथियो...!
००


Chitra : Kumar Virendra











एक कविता

जब रचना में संवेदना अपने गहरे स्रोतों के साथ होती है, तब उसके कथ्य से चाहकर भी जल्दी मुक्त हो पाना सम्भव नहीं होता...तब तो और नहीं, जब उसके स्वर में अपना भी एकांश शामिल हो...!
ऐसी ही एक रचना कई माह पहले पढ़ने को मिली...जो जितना इतिहास, उतना ही अपने वर्तमान की यात्रा में घटित होते मनुष्यों की दुनिया में मनुष्यों की पीड़ा का एक चुनैती-भरा पाठ रचती है कि किसी भी समाज में जीवित होने का अर्थ सिर्फ़ वही नहीं जो दिख रहा, बल्कि जो देख नहीं पा रहे या देखना नहीं चाह रहे, वह भी है...!
अपने वितान में युगों को जीती मेरे लिए एक अविस्मरणीय कविता...इस कविता के लिए शशि दी (shashikala rai ji) की क़लम को प्रणाम...!

धूप की गर्मी और हवा के नमक से*
__________________________________________________शशिकला राय

आजकल टीवी समाचार चैनलों को देख
बरबस याद आ जाता है
बचपन के बाइस्कोप वाला मुखड़ा—
‘देखो, दिल्ली का कुतुबमीनार देखो !’
कुतुबमीनार पिघल रहा है
घुल रहा है मुझमें नमक की तरह
मैं नए नाम के ‘खटके’ से भरी
घूमती हूँ इस चैनल से उस चैनल
अचानक चौंक कर ठहर जाती हूँ
उस चैनल पर जहाँ गिनाई जा रही हैं
ग़लतियाँ इतिहास की
अकबर महान नहीं, क्रूर था
उस क्रूरता के लिए
उसका मुसलमान होना ही काफ़ी था...
उसी कड़ी में दूसरा क्रूर शासक था
टीपू सुलतान !
मैं लौटी ही थी ‘टीपू’ की उजड़ी मजार से
महल के वीरान गलियारे में
काँच के पीछे से मैंने किया था
‘टीपू’ के धूसर नीले मटमैले
को आँखों ही आँखों में सलाम !
‘टीपू’ तुम्हारी प्रार्थनाओं में शामिल था
श्रृंगेरी मठ
तुम रोप रहे थे फ़्रांसीसी क्रान्ति की
विजय पथ में पौधे
बनवा रहे थे
अपने महल से लगकर एक मन्दिर
मैं देख रही थी
टीवी का मुँह बकर-बकर
और तुम्हारे वंशज खींच रहे थे रिक्शा !
स्मृतियों में कौंधता है
सोने-सा मैसूर राजमहल
आज भी दशहरे के दिन
चामुंडा विराजती है
इसी महल के
साढ़े सात सौ किलो सोने से बने
स्वर्ण आसन पर
 जिस पर आसीन होते थे कभी राजे-महाराजे !
सुनते हैं फिरंगी बड़े मित्र थे राजा के
बाल बांका भी न हो पाया कभी महल का
वैसे ही (बे)‘ग़ैरतमन्द’ हो पाते जो टीपू तुम भी
दाल में नमक जितना
 सोने में ताँबे जितना
तो शोभते स्वाद और अलंकार सारे
पढ़ती हूँ उसी ताप में कुमार की
अपनी आग के साथ जीती कविताएँ
‘कविता में कहने की आदत नहीं’
पर वे कहते हैं
दोनों भुजाएँ फैला कर
आर्त्तानाद करता कवि नहीं सुना गया
आज
तो नष्ट हो जाएगी कविता की समूची पीढ़ी
मैं देना चाहती हूँ कुमार को वह ‘घंटा’
जिसके बजते ही राजा आ जाया करता है
सुनता है रियाया की फ़रियादें
कहते हैं फ़र्क़ ही मिट गया रियाया और राजा का
भला तुम्हें क्या दरकार?
राजा तो अब भी है...
पर सुनने की वजहें मिटा चुका है
कहता है बना नहीं बनाया गया हूँ
बनने की वजह यही थी कि
सुनता नहीं (किसी की) कर देता हूँ मन की
वजह दाँव पर लगा नहीं सकता
शवों की सीढ़ियों पर टिका है सिंहासन मेरा
समझो मेरी बेबसी को
और सराहो मेरे बहरेपन को !
दिल्ली की नाम बदलती सड़कें
कुमार का आर्त्तनाद
टीपू सुल्तान का उजड़ा दयार
भौंचक्क-सी मैं
बेबसी की स्याह सुरंग में तलाशते हैं
चिंगारियाँ प्रतिरोध की
देखते हैं नागफनी के बीच उगते छोटे लाल फूल
इन फूलों से कोई गहरा नाता लगता है
पढ़ते हैं पाश की कविताएँ
गाते हैं फ़ैज़ की नज़्में
मृत्यु के बाद भी आँखें खुली रखने की
करते हैं दुआएँ लोर्का बन
दूर कहीं गोरख पांडे की लोक धुनों में
कराहती है मैना
गहराती साँझ में दीये की तरह
उभरता है ‘अलपोस्तीनो’
मैं देखती हूँ कोल्हापुर की
चक्करदार स्याह गलियाँ
कॉमरेड पानसरे तुमने यहीं खोया था अपना बेटा
और हमने तुम्हें !
डॉक्टर (नरेन्द्र दाभोलकर)
मुट्ठी-भर काया में कायनात लिए तुम
भी तो डोला करते थे
तुम नहीं मानते थे किसी ईश्वर को
डॉक्टर हँसूँ या रोऊँ ?
तुम्हें और राम मन्दिर के पुजारी लालदास
को मारने वाले दो नहीं थे
बात थमी नहीं यहीं तक
कलबुर्गी भी...
अब क्या बाक़ी रह गया देखना
देख ली क़लमों की, फ़सलों की हत्या
और आत्महत्या
मुरुगन तुम्हारी किताबों को कर दें
हम आग के हवाले ?
नहीं, मुझे मंज़ूर नहीं जौहर प्रथा
मैं नहीं देखती उसमें शौर्य का इतिहास
शब्दों की छूँछी नालियाँ कुत्तों की दुमों में लगा दी गई हैं
अर्थ बेतरह हाँफ रहे हैं
तुम मुझे ‘मुरथल’ दोगे, मन्दिर नहीं
सुनो मेरे भी दरवाज़े बन्द हैं मन्दिर के लिए
मैं तुम्हारी सोच को आग लगा सकती हूँ
भीगी माचिस से भी
यक़ीन नहीं...
तो पढ़ लो ध्यान से शर्मीला और सोनी का
 चेहरा
तुमने बदल दिए पेड़ों के धर्म
गाएँ चराने वाले जिन डालियों पर बैठकर
 बजाते रहे बंशी
उन्हीं के ख़ून से रँग दी तुमने डालियाँ
हमने सुना था पड़ोस के रसोइए कालूराम से
‘वे लोग’ बड़े जल्लाद होते हैं
उन्हें जल्लाद ठहराने के हैं
कई नाजायज़ क़िस्से कालूराम के पास
जिसकी दुनिया सीमित है एक अदद रसोई
या कि सब्ज़ी वाले, पंजाबी किराने की दूकान तक
कहाँ से बहता है ख़बरों का यह सोता ?
जो बासठ वर्षीय कालूराम और दस वर्षीय
बसंते को एक सा अबोध बना देता है
‘अरे दीदिया, जल्दी चल, उसलमान
ही उसलमान !’
मैं याद नहीं करना चाहती
बरबस याद आ जाती हैं
शकीरा के बच्चों की सहमी आँखें
मौसम की नमी में, डेंगू पसरने से
हमें भगा तो न दिया जाएगा शहर से
मैं हौसले का एक छोर थमा देना चाहती हूँ
उन बच्चों को
बैठ जाती हूँ पस्त होकर
नाभि तक मेरे उड़े हैं
‘राहुल’ के एनकाउंटर से रक्त के छींटे
पुलिस ने नहीं, उसे द्वेष ने मारा है
मेरे पढ़े को, बूझे को, स्मृतियों को
‘ढोला’ और ‘जला’ के गीतों को
छीन लिया तुमने...
अकबर, औरंगज़ेब, मीर ज़ाफ़र, टीपू सुल्तान
को मैंने
पढ़ा नहीं एक पंक्ति में
कर्म के आधार पर वे ठहरते थे विरोधी
कि धर्म के जाने तुमने उन्हें रख दिया
एक ही पाले में
कुछ पीढ़ियाँ बीतते न बीतते
शायद
 ढकेल दोगे 'कलाम' को भी उसी पाले में
इस प्यासी धरती के भीतर
सोई हैं चादर ताने सब पुराकथाएँ
सब माने सब !
कभी कोई वसंत केदार गाता कवि
चादरें हटाएगा !
कोई हरिप्रसाद चौरसिया बाँसुरी बजाएगा
किसी केसरबाई केरकर की आवाज़ ऊँची
उठती जाएगी
किसी बिरजू महाराज, प्रेरणा श्रीमाली
की संगत से माटी थिरकेगी
किसी अमृता शेरगिल की स्त्री
रंगों के गीलेपन समेत उठ खड़ी होगी
अल्लाह जिलाबाई की आस कोई
केसरिया बालम न ठुकराएगा
कोई बिस्मिल्लाह ख़ान सच्चे
मोतियों-सा सुर लगाएगा
जिस दिन सन्नाटे को चीर
बेख़ौफ़ हँसी पर्वत की सबसे
हसीन चोटी से टकराएगी
उस दिन मंटो की कहानियों का स्वर
बदल जाएगा
किसी कहानी में किसी की ‘सलवार’ का
ज़िक्र न आएगा !
_______________
(जल-जलाल : कुमार वीरेन्द्र 'लुकाठियन') 
(*फ़ज़ल ताबिश की कविता की पंक्ति)
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