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| Chitra : Kumar Virendra |
बस यूँ ही…तीन साल पहले लिखी गई, युवा साथी सुनील श्रीवास्तव की यह कविता ‘जनराह ब्लॉग’ पर दिख गई तो सोचा कि साझा कर लूँ…बस साझा…!
० तमीज़ ०
(कुमार वीरेन्द्र के प्रति)
गमछिया रख दो न वीरेन्द्र भाई
क्या रखा है इस लाल गमछी में
जो हमेशा गले लगाए फिरते हो
क्या रखा है इस लाल गमछी में
जो हमेशा गले लगाए फिरते हो
तुम तो पहचानते हो इस समय को
यह अपनी ज़रूरतों को
तरजीह देने का समय नहीं है
उनकी संहिताओं को मानने का समय है
वे विश्वास नहीं करेंगे
किसी में आज भी बची है क़ूवत
कि अपने रंग में रँगा
घूमता है उनकी दुनिया में
यह अपनी ज़रूरतों को
तरजीह देने का समय नहीं है
उनकी संहिताओं को मानने का समय है
वे विश्वास नहीं करेंगे
किसी में आज भी बची है क़ूवत
कि अपने रंग में रँगा
घूमता है उनकी दुनिया में
तुम भूल गए क्या
राजधानी का वह दफ़्तर
चपरासी ने उतरवा लिया था गमछा
भीतर भेजने से पहले
तुम पूछ भी तो नहीं पाए थे
उस आई.ए.एस. अधिकारी से
कि साहब क्यों कर दिया जाता है नंगा
हमें आपसे मिलने से पहले
राजधानी का वह दफ़्तर
चपरासी ने उतरवा लिया था गमछा
भीतर भेजने से पहले
तुम पूछ भी तो नहीं पाए थे
उस आई.ए.एस. अधिकारी से
कि साहब क्यों कर दिया जाता है नंगा
हमें आपसे मिलने से पहले
दूर क्यों जाएँ
वह हमारे प्रतिनिधियों की सभा थी
चुने हुए प्रतिनिधियों की सभा
गेट पास था तुम्हारे पास
फिर क्यों शक हुआ प्रहरियों को
सुरक्षा के दुश्मन
गमछी लटकाकर ही आते हैं क्या
वह हमारे प्रतिनिधियों की सभा थी
चुने हुए प्रतिनिधियों की सभा
गेट पास था तुम्हारे पास
फिर क्यों शक हुआ प्रहरियों को
सुरक्षा के दुश्मन
गमछी लटकाकर ही आते हैं क्या
मैं ही क्या कहूँ
मेरी गली के कुत्ते भी तो
भौंकने लगे थे उस दिन
तुम्हारे गले में गमछी देखकर
मेरी गली के कुत्ते भी तो
भौंकने लगे थे उस दिन
तुम्हारे गले में गमछी देखकर
ख़तरनाक समय है वीरेन्द्र भाई
कुत्ते भी सीख गए हैं
आदमी की तमीज़
कुत्ते भी सीख गए हैं
आदमी की तमीज़
गमछिया उतार दो भाई
गुज़रने नहीं दिया जाएगा वरना
तुम्हें किसी गली से...!
गुज़रने नहीं दिया जाएगा वरना
तुम्हें किसी गली से...!
००

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