Tuesday, March 7, 2017




'रू' की राह में...!

जब मित्र पूछते कि क्या आपकी पत्रिका---'रू'-क़लम की ज़मीन---बन्द हो गई...या उसका अंक अब कब आनेवाला है...?
ऐसे में मैं अक्सर चाहकर भी किसी से ठीक-ठीक कुछ कह नहीं पाता था...कि मेरे लिए अपना लेखन हो या सम्पादन, अपनी शर्तों पर जीने-मरने के प्रश्नों से जुड़ा रहा है...यही कारण कि वह 'रू' का प्रवेशांक, जो 'आज का हिन्दी साहित्य और गाँव का यथार्थ' विषय पर केन्द्रित (पृष्ठ--250) हो...या असमिया कवयित्री मणिकुंतला भट्टाचार्य और मैथिली कवि तारानंद वियोगी पर केन्द्रित कविता-पुस्तिकाएँ... या 'नक्सलवाद और हिन्‍दी साहित्‍य' पर केन्द्रित वह अंक, जिसे काफ़ी बृहद् होने के कारण अन्ततः अभाव में नहीं ही निकाल पाया (...जिससे कुछ लेखक कुछ दिनों के लिए नाराज़ भी रहे...) और सामग्रियाँ जाने कहाँ-कहाँ बिखर गईं... सच, यह सब मेरे जीने-मरने का ही हिस्सा...!
...क्या कहूँ कि इन दिनों एक छटपटाहट-सी...कि क्यों न 'रू' को फिर से शुरू किया जाए...क्यों न एक लड़ाई और लड़ी जाए...!
उम्मीद...और संघर्ष...की राह में...'रू' के पहले अंक (जनवरी, 2011) का यह कवर, जो मुझे आज भी प्रिय...बहुत प्रिय...बहुत-बहुत, साथियो...!
००

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