Friday, May 13, 2016

केवाल

04
  उसकी उम्र...!
कुमार वीरेन्द्र



…आपकी इस टिप्पणी ने मुझे अपने मित्र बाउबा की याद दिला दी…जो इतने क़रीब से मुझे जानता था कि ऐसा कई बार होता, जब मैं समझ ही नहीं पाता कि यह मैं ही हूँ, या कोई और…!

…शायद इसलिए कि मैं अपने अँधेरे से जब भी बाहर निकलता, चलते-चलते पता ही नहीं चलता कब किसी और के अँधेरे में चलता जा रहा…और अगर कोई टोकता भी तो बस उसे सलाम कर बढ़ता चला जाता…!

...सच कहूँ, तो...
…जीने को लड़ते, रचते रहने की अपनी जो एक मात्र राह, उसकी उम्र बढ़ा दी है आपने…!

…यह स्नेह अनमोल…!
…इसे प्रणाम…!

.....✍
 कविताई
सवाई सिंह शेखावत 

मित्रो, आज प्रस्तुत है युवा कवि भाई कुमार वीरेन्‍द्र की कविता। कुमार उन कवियों में हैं जो कविता को जीते हैं---उनकी कविता जीवन और उसके स्रोतों से सीधे जुड़ी है। वे जीवन के ज़रूरी देशज सन्दर्भों पर बिना किसी भूमिका के सीधे ही सम्बोधित करना अधिक पसन्‍द करते हैं। शब्दों के व्यर्थ अपव्यय के बरक्स उनके यहाँ जीवन की मार्मिक प्रस्तुति अधीन माने रखती है, इसीलिए मालगुज़ारी बढ़ते ही उनके यहाँ चाँद अपना आकर्षण खो देता है। उन्हें लगता है : 'मृत्यु को जीना कोई गुनाह नहीं / गुनाह है जीने की चाह में मृत्यु को ओढ़ना / उसे ओढ़े रहना…!' और यह भी कि 'हर पुलिया / सिर्फ़ दो किनारों को / जोड़ने के लिए / नहीं होती...!' अपनी अन्तिम इच्छा पूछे जाने पर वे इतना-भर कहते हैं : 'कि अन्तिम...अन्तिम इच्छा तो / पराजित लोगों के पास होती है…!'
कवि-लेखक : सवाई सिंह शेखावत

अपनी सहज काव्य मेधा के बल पर कैसे ज़िन्‍दगी की काली खोह में भी जीवन की उजली उम्मीद ढूँढ़ी जा सकती है उनकी इस कविता में साफ़ देखा जा सकता है।।काफ़ी गहरी हो चुकी रात में उनसे पहले बीडी, फिर माचिस माँगता अजनबी पलट कर पूछता है कि--"घर नहीं जाना...भूख नहीं लगी...?" और जाते-जाते माचिस लौटाते हुए जीवन की चरम सीख दे जाता है कि--'...जीवन...यह जीवन...! / आग का सिरजन है, बेटा...! / इसका धरम... / राख नहीं हो सकती !' इसका धरम (बुझी हुई) राख नहीं हो सकता। मितकथन और जीवन के देशज सार्थक प्रयोजन का विकट साक्ष्य रचती ऐसी कविताएँ इस भारत महान में रोज़-रोज़ घटित होती हैं,लेकिन कितने कम कवियों का ध्यान उधर जाता है ! हम अक्सर दूर की कौड़ी लाने के चक्कर में नक़ली कविताएँ लिखते हैं और प्राय: जन और जीवन से पलायन किए रहते हैं।


सिरजन 

रात काफ़ी गहरी हो चुकी थी
जिसे जाने बिना बैठा था पुलिया पर

जाने कौन था वह, जाने कौन...?
लाठी ठकठकाते आया और खड़ा हो गया
और पहले माचिस...फिर बीड़ी माँगी...!

फिर पूछा--"घर नहीं जाना...भूख नहीं लगी...?"
"... ... ... !"
फिर कुछ नहीं पूछा...!

माचिस लौटाते और जाते...यही...
...बस...यही...कहता गया---

...जीवन...यह जीवन...!
आग का सिरजन है, बेटा...!

इसका धरम...
राख नहीं हो सकती !

●●   
केवाल

03                          
                                           एक हरे पत्‍ते के लिए...!
                                                                     कुमार वीरेन्द्र

वरिष्‍ठ कवि जगदीश नलिन

8 साल पहले जब 'जलेस', भोजपुर की एक गोष्ठी में सर ने यह कविता सुनाई, मैं भावुक-सा हो गया...अपनी रिक्तता में रहा कई दिनों तक...और अन्ततः सिर्फ़, सिर्फ़ यही समझ पाया कि ज़िम्मेदारियाँ और बढ़ गई हैं...समझ पाया कि आगे संकट चाहे जो भी हो, और कोई साथ न भी दे, तब भी अपने ख़तरों के साथ अकेले जीना है, जीना ही है मुझे...और जो तय रास्ता, चलते रहना है उस पर, चलते ही रहना है...जहाँ तक...देखती रहें आँखें, चलते रहें पाँव...एक भी...एक भी...हरे पत्ते के लिए...!
००





कुमार वीरेन्द्र
जगदीश नलिन
............✍
कुमार वीरेन्द्र, युवा
लेकिन मुझ बूढ़े का साथी
लौट आया है इन दिनों अपने गाँव
वर्षों बाद महानगरों के प्रवास से
लकदक नहीं, गँवई चोले में
गले में लपेटे गमछा
लालधारी वाला
वह कवि है--युवा कवि


गाँव में तक़रीबन
रोज़ ही जाड़े की भोरहरिया में
रजाई की गरमाहट को जीभ बिराते
निकल जाता बधार में दूर तलक
और उस कँपकँपी में गंगा कछार तक
जो भी कुछ ख़ास देखता
झट क़लमबन्द कर लेता कोरे हरफ़ों में
प्रायः प्रत्येक दिन रच डालता
गँवई मिट्टी की सोंधी गन्ध में
रची-बसी कविता
सिर्फ़ ठंड के दिनों में नहीं
मौसम के अन्य दिनों में
उसकी रचनाशीलता
अपनी रफ़्तार
बनाए रखती बदस्तूर

क्या नहीं है
उसकी क़ाबिलियत में--
संवेदनशील मस्तिष्क, श्रम से
तपा ताम्बई शरीर
रूखा-सूखा खा कैसे भी जी लेने का हौसला
ज़रूरतमन्दों की ख़ातिर अपनी सारी की सारी
अहमियत लुटा देने की सनक
श्रमजीवियों के प्रति असीम करुणा
मजलूमों के जलते-सुलगते घरों के लिए
आँखों में अथाह जलराशि
खेतों में छूट गए अनाज के दाने चुगते
नन्हे परिन्दों की क़तार की तरह
ग़रीबगुरबों के लिए
हमदर्दी

कविता
उसकी ज़िन्दगी है
अलाव के इर्द-गिर्द
कनमनाते नदी-जल में
शीतियाए परती पड़े खेतों में
झमाट फैली दूबों की ओट में
या कि ज़बरन काट ली गईं फ़सलों की जड़ों में
रेह छोड़ती मिट्टी में दबे कविता के सूक्ष्म बीज
खुर्दबीनी आँखों में तलाशता फिरता
नदियों के कछार, मेड़ों, पगडंडियों में
बँटे बियाबान
वे जगहें हैं जहाँ उत्खनन की प्रतिक्षा में
होते हैं इतिहास के ध्वस्त खंडहर--
हमारी संस्कृतियों के अवशेष
और होते हैं अपने हक़ के लिए
नाफ़रमानी के एवज़
मार दिए गए बेबस कामगारों व
मज़दूरों के मिट्टी बने जिस्म
कितने-कितने वाजिब, ग़ैरवाजिब
वारदातों के क़िस्से
और कहीं-कहीं
उगे होते हैं क्यारियों में
प्यार के झूमते
हुए रंग-बिरंगे फूल

किसी खोजी
दस्ते ने न की होगी ऐसी
अलग-अलग सच की
पड़ताल के लिए मशक्कत
बहुत दूर तक का सफ़र तय है
उसके सख़्त इरादे वाले
पाँवों के लिए !

(कविता-संग्रह 'सपना साथ नहीं छोड़ता' से)

०० 


० Kumar virendra ० 

Kumar virendra, quite a young man
But a very close friend of an old man
Like me has come back to his village
These days after years of abode
In metropolitan cities
Rolling up a red lined napkin
Around his neck in rustic costumes
In stead of being well dressed
He is a poet,very up-to-date poet
Of young generation
In village almost everyday
Showing thumb to the warmth of the quilt
He goes out towards the corn fields
Up to the river side of the river Ganges
In shivering chill of early morning of winter
Whatever significant sight he happens to
Come across immediately he puts it down
In utterly raw words
Almost everyday he composes a poem
With frying rural smell
Not only on the cold days of winter
On the days of other seasons too
His writing practices remain going on
With the same spirit and zeal as usual
There are no shortcomings
In his capabilities
Sensitive mind
Copper tinged body
Owing to doing hard manual work
Zeal to live eating whatsoever
Dried up stale food is available
Craze to give away all of his possessions
To the needy people
Unlimited compassion for
The poor working people
Unmeasurable water resources in his eyes
For the burning hamlets of the poor
Intense sympathy for those who live by
Picking food grains left in the fields
Like the rows of little birds
During the reaping period of crops
Poetry is his life
With his microscopic eyes he remains Wandering looking for minute seeds
Of poetry
Around the fire kindled,
In ice cold water,
On the damp barren lands,
Under the shed of dense bunch like Creeping grass
Or in the roots of forcibly cut away crops
Burried under the nitre bearing soil
The bank grounds of the rivers
The wilderness distinguished
By moulds and by-paths
Are the places
Where there remain waiting for excavation Of the pulled down ruins
Of history,the remains of our cultures
And there are bodies made mud
Of helpless workers having been shot Down
For disobedience in favour of their parts
There are stories of innumerable legal and illegal incidences
And at some places
There are bloomed vivid colourful dancing
Flowers of love in rows
No any searching team might have ever
Taken so much pains to find out
The truths separately
Travelling to far off destination
Is destined for
His strongly determined feet

(नोट : इस कविता का अंग्रेज़ी अनुवाद नलिन जी ने ख़ुद किया है )