केवाल
…आपकी इस टिप्पणी ने मुझे अपने मित्र बाउबा की याद दिला दी…जो इतने क़रीब से मुझे जानता था कि ऐसा कई बार होता, जब मैं समझ ही नहीं पाता कि यह मैं ही हूँ, या कोई और…!
…शायद इसलिए कि मैं अपने अँधेरे से जब भी बाहर निकलता, चलते-चलते पता ही नहीं चलता कब किसी और के अँधेरे में चलता जा रहा…और अगर कोई टोकता भी तो बस उसे सलाम कर बढ़ता चला जाता…!
⚪ 04
उसकी उम्र...!
⚪ कुमार वीरेन्द्र
…आपकी इस टिप्पणी ने मुझे अपने मित्र बाउबा की याद दिला दी…जो इतने क़रीब से मुझे जानता था कि ऐसा कई बार होता, जब मैं समझ ही नहीं पाता कि यह मैं ही हूँ, या कोई और…!
…शायद इसलिए कि मैं अपने अँधेरे से जब भी बाहर निकलता, चलते-चलते पता ही नहीं चलता कब किसी और के अँधेरे में चलता जा रहा…और अगर कोई टोकता भी तो बस उसे सलाम कर बढ़ता चला जाता…!
...सच कहूँ, तो...
…जीने को लड़ते, रचते रहने की अपनी जो एक मात्र राह, उसकी उम्र बढ़ा दी है आपने…!
…यह स्नेह अनमोल…!
…इसे प्रणाम…!
.....✍
मित्रो, आज प्रस्तुत है युवा कवि भाई कुमार
वीरेन्द्र की कविता। कुमार उन कवियों में हैं जो कविता को जीते हैं---उनकी
कविता जीवन और उसके स्रोतों से सीधे जुड़ी
है। वे जीवन के ज़रूरी देशज सन्दर्भों पर बिना किसी भूमिका के सीधे ही
सम्बोधित करना अधिक पसन्द करते हैं। शब्दों के व्यर्थ अपव्यय के बरक्स उनके
यहाँ जीवन की मार्मिक प्रस्तुति अधीन माने रखती है, इसीलिए मालगुज़ारी बढ़ते
ही उनके यहाँ चाँद अपना आकर्षण खो देता है। उन्हें लगता है : 'मृत्यु को जीना
कोई गुनाह नहीं / गुनाह है जीने की चाह में मृत्यु को ओढ़ना / उसे ओढ़े रहना…!' और
यह भी कि 'हर पुलिया / सिर्फ़ दो किनारों को / जोड़ने के लिए / नहीं होती...!' अपनी
अन्तिम इच्छा पूछे जाने पर वे इतना-भर कहते हैं : 'कि अन्तिम...अन्तिम इच्छा
तो / पराजित लोगों के पास होती है…!'
अपनी सहज काव्य मेधा के बल पर कैसे ज़िन्दगी की काली खोह में भी जीवन की उजली उम्मीद ढूँढ़ी जा सकती है उनकी इस कविता में साफ़ देखा जा सकता है।।काफ़ी गहरी हो चुकी रात में उनसे पहले बीडी, फिर माचिस माँगता अजनबी पलट कर पूछता है कि--"घर नहीं जाना...भूख नहीं लगी...?" और जाते-जाते माचिस लौटाते हुए जीवन की चरम सीख दे जाता है कि--'...जीवन...यह जीवन...! / आग का सिरजन है, बेटा...! / इसका धरम... / राख नहीं हो सकती !' इसका धरम (बुझी हुई) राख नहीं हो सकता। मितकथन और जीवन के देशज सार्थक प्रयोजन का विकट साक्ष्य रचती ऐसी कविताएँ इस भारत महान में रोज़-रोज़ घटित होती हैं,लेकिन कितने कम कवियों का ध्यान उधर जाता है ! हम अक्सर दूर की कौड़ी लाने के चक्कर में नक़ली कविताएँ लिखते हैं और प्राय: जन और जीवन से पलायन किए रहते हैं।
✔ सिरजन ✔
रात काफ़ी गहरी हो चुकी थी
जिसे जाने बिना बैठा था पुलिया पर
जाने कौन था वह, जाने कौन...?
लाठी ठकठकाते आया और खड़ा हो गया
और पहले माचिस...फिर बीड़ी माँगी...!
फिर पूछा--"घर नहीं जाना...भूख नहीं लगी...?"
"... ... ... !"
फिर कुछ नहीं पूछा...!
माचिस लौटाते और जाते...यही...
...बस...यही...कहता गया---
...जीवन...यह जीवन...!
आग का सिरजन है, बेटा...!
इसका धरम...
राख नहीं हो सकती !
●●
…जीने को लड़ते, रचते रहने की अपनी जो एक मात्र राह, उसकी उम्र बढ़ा दी है आपने…!
…यह स्नेह अनमोल…!
…इसे प्रणाम…!
.....✍
कविताई
⚪ सवाई सिंह शेखावत
![]() |
| कवि-लेखक : सवाई सिंह शेखावत |
अपनी सहज काव्य मेधा के बल पर कैसे ज़िन्दगी की काली खोह में भी जीवन की उजली उम्मीद ढूँढ़ी जा सकती है उनकी इस कविता में साफ़ देखा जा सकता है।।काफ़ी गहरी हो चुकी रात में उनसे पहले बीडी, फिर माचिस माँगता अजनबी पलट कर पूछता है कि--"घर नहीं जाना...भूख नहीं लगी...?" और जाते-जाते माचिस लौटाते हुए जीवन की चरम सीख दे जाता है कि--'...जीवन...यह जीवन...! / आग का सिरजन है, बेटा...! / इसका धरम... / राख नहीं हो सकती !' इसका धरम (बुझी हुई) राख नहीं हो सकता। मितकथन और जीवन के देशज सार्थक प्रयोजन का विकट साक्ष्य रचती ऐसी कविताएँ इस भारत महान में रोज़-रोज़ घटित होती हैं,लेकिन कितने कम कवियों का ध्यान उधर जाता है ! हम अक्सर दूर की कौड़ी लाने के चक्कर में नक़ली कविताएँ लिखते हैं और प्राय: जन और जीवन से पलायन किए रहते हैं।
✔ सिरजन ✔
रात काफ़ी गहरी हो चुकी थी
जिसे जाने बिना बैठा था पुलिया पर
जाने कौन था वह, जाने कौन...?
लाठी ठकठकाते आया और खड़ा हो गया
और पहले माचिस...फिर बीड़ी माँगी...!
फिर पूछा--"घर नहीं जाना...भूख नहीं लगी...?"
"... ... ... !"
फिर कुछ नहीं पूछा...!
माचिस लौटाते और जाते...यही...
...बस...यही...कहता गया---
...जीवन...यह जीवन...!
आग का सिरजन है, बेटा...!
इसका धरम...
राख नहीं हो सकती !
●●


