Saturday, September 3, 2022

 


                       नंदना पंकज 

कुमार वीरेन्‍द्र एक ऐसे सरल सहज व्यक्तित्व का नाम है जो बड़ी ख़ामोशी और संजीदगी से सरल किन्‍तु ठोस कविताएँ लिखते हुए जनचेतना का कार्य लगातार कर रहे हैं...अभी तक मैंने उनकी जितनी भी कविताएँ पढ़ी हैं,  उनमें न भाषाई लाग-लपेट के भारी-भरकम शब्द होते हैं, न कोरी काल्पनिक ऊँचाइयों के उलझानेवाले बिम्‍ब...वे बिल्कुल आम जीवन के सच्ची घटनाओं, पात्रों, बिम्‍बों का बड़ी सजीवता से चित्रण करते हुए कोई गहरी बात कह जाते हैं, कोई महत्‍त्‍वपूर्ण सन्‍देश दे जाते हैं। उनकी कविताओं को समझने के लिए बस गहरी संवेदना की ज़रूरत पड़ती है। उनकी कविताओं से जूड़ना अपनी जड़ों को सींचना है। उनकी कविताओं में जहाँ 'रेणु' की पारम्‍परिक आंचलिक आम देहात का प्राकृतिक सौन्‍दर्य अभिभूत कर देता है, वहीं 'बाबा नागार्जुन' की तरह ज्वलन्‍त मुद्दे उठाकर व्यवस्था पर चोट करती हैं...( इसे मेरी व्यक्तिगत सोच समझी जाए, मैं कोई समीक्षा नहीं कर रही हूँ)।

उनकी कविताओं का 'आम' होना ही सबसे बड़ी ख़ासियत है...उनकी सादगी उनके ऊँचे विचारों की देन है...उनके व्यक्तित्व में मिट्टी की खरी सुगन्‍ध है...उनके सरल स्वभाव और मित्रवत् व्यवहार की मैं प्रशंसक हूँ...एक ठेठ और ठोस जनवादी चेतना का परचम उनके गले में लाल गमछा जैसा लिपटा रहता है...आज उनके जन्मदिन पर मेरी ह्रार्दिक शुभकामनाएँ उनके साथ है...आज उनकी क़लम को चूमकर मैं कहना चाहती हूँ कि इस क़लम की स्याही की धारा निरन्‍तर बहती रहे और क्रान्ति की ज़मीन को ऊर्वर करती रहे...।

कुमार वीरेन्‍द्र, मित्र हमें आपसे और आपकी कविताओं से बहुत प्रेम है...आपकी संवेदनशील, सहज-सरल प्रगतिशील मानवतावादी विचारों को हमारा सलाम ही सलाम !

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कुमार वीरेन्द्र, आप कविता लिखते हैं कि सनिमा दिखाते हैं एक बार उनकी कविता पढ़कर टिप्पणी की थी मैंने...मगर देर तक सोचती रही--क्या यह टिप्पणी उपयुक्त है, हमारे हिन्‍दी सिनेमा में न तो इतनी वास्तविकता होती है और न ही इतनी सजीवता जैसाकि कुमार वीरेन्द्र अपनी कविता में रच जाते हैं...कभी जेठ का घाम, लू और उड़ती धूर-मिट्टी तो आषाढ़ की घटाएँ, सावन-भादों की कादो-भरी पगडंडियाँ, बूँट-रहर, झाड़-झंखाड़, खलिहान, मचान, कुत्ता-बिलार, चिरैया-मैना, बाढ़-सुखाड़; वे हर मौसम में ग्राम्य जीवन और अपने गाँव के हर कोने का सीधा-प्रसारण करते मालूम पड़ते हैं...जब उनकी कविता गड़ही के पानी में छपछपा रही होती है, मैं अपने पैरों की उँगलियों के बीच और तलवों पर उसकी किचकिचाहट और गड़ही में छिलमिलाती मछलियों की गंध बड़ी शिद्दत से महसूस करती हूँ। उनकी कविता से निकला डोंड़ देर तक मेरी छाती पर गेहूँवन की तरह लोटता रहता है। उनकी कविता जब भी कउड़े की आँच से तपाती है, आँखें धुएँ से जलने लगती हैं...उनकी कविता के हर दृश्य में अपने-आप को उपस्थित पाती हूँ। यों लगता है ये सब मेरी ही भूली हुई स्मृतियाँ हैं जो एक-एक कर दृश्यमान हो रही हैं। आजी, नानी, बाबा सब अपने लगते हैं और उनकी बातें, दुलार-फटकार की बातें कितनी सच्ची और गहरी होती हैं। प्राकृतिक, सामाजिक, राजनीतिक हर रूप में गाँव और ग्रामीणों का वास्तविक चेहरा दिखाती हैं उनकी कविताएँ। स्वभाव से विचारों में जितनी तरल, उतनी ही ठोस ये कविताएँ आवाज़ उठाती हैं, सवाल करती हैं, और जवाब भी देती हैं। इन कविताओं में जीवन धड़कता है। अपनी असली संस्कृति झलकती है। अपनी मिट्टी के सौंधापन को हमारे भीतर बचाए और बनाए रखती हैं उनकी कविताएँ। अपने जड़ों से कटने से बचा रही हैं हमें। और भी बहुत कुछ है जो मेरे लिए कह पाना मुश्किल है...।

आज उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य पर बस इतना कहना चाहती हूँ कि बने रहें आप कि बनी रहे हमारे भीतर मिट्टी की महक, बचे रहें आप कि बची रहे हमारे भीतर की मानवीय संवेदनाएँ। बनी रही आपकी क़लम की उर्वरता, आपकी सच्चाई और ईमानदारी, आपकी सादगी और आपके गले में लिपटा ललका गमछा भी बना रहे। आप जैसे सरल और सच्चे व्यक्ति बहुत मुश्किल से मिलते हैं। मुझे बेहद ख़ुशी और गर्व है कि आप हमारे मित्र हैं...एक बेहतरीन कवि और उससे भी बढ़कर एक बेहतरीन इंसान, कुमार वीरेन्‍द्र आपको दिल से प्यार भरा सलाम ही सलाम...!

(नोट : हिन्‍दी की युवा कवयित्री नंदना पंकज जी द्वारा फ़ेसबुक पर 15 अगस्‍त, 2016 और 15 अगस्‍त, 2018 को पोस्‍ट की गई थीं ये टिप्‍पणि‍याँ।)

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