संतोष कुमार झा
वीरेन्द्र विशुद्ध और खाँटी गँवई भावबोध के कवि हैं। बोलियों से गुम होती
ध्वनियों को पकड़ने और ग्राम्य-जीवन के
सम्बन्धों की पड़ताल जिस ख़ूबसूरती से करते हैं, उसकी मिसाल युवा कवियों
में मिलना मुश्किल है। खेत-बधार, पीपल-पाकड़, आहार-पइन, गाय-गोरू, माई-इया (दादी), लोक-व्यवहार, परब-त्योहार सब कविता
में ऐसे लयबद्ध हो जाते हैं कि क्या कहने ! भोजपुर की माटी की सुगन्ध क़ायम रहे, प्यारे कवि !
(नोट : 15 अगस्त, 2018 को पोस्ट की गई टिप्पणी)
००
कोई कविता सिर्फ़ कविता नहीं होती, वह होती है उस वक़्त का इकबालिया बयान और भविष्य की चेतावनी भी...! भाई कुमार वीरेन्द्र की अद्भुत कविता !
० ई ऊ गाँव है ०
सुरुज उग
रहा था
आजी घर के
पिछवाड़े
गोबर सान रही थी,
कई लोग
नारे लगाते
दुआर पर चढ़े,
मैं जो लोइया ढोने के लिए खड़ा, आजी संग आया,
देखा, बाबूजी चिल्ला
रहे हैं, उनकी चिल्लाहट कई बार सुनी थी, यह पहली बार जो उनकी आँखें,
धधकती हुई लाल दिखीं
सुरुज उग
रहा था;
और आजी जैसे उसकी ओट में, कान आड़े सुन रही थी,
बाबूजी बौख
रहे थे, ‘तुम लोगों को मालूम है, का कर रहे हो, अरे गाँव में, दु-चार गो तो घर
हैं उनके, आज राम के नाम पर ईंट माँग रहे हो, कल उनके नाम पर
उनकी हत्या
करोगे,
अरे सोचो भले रहते हैं गाँव के पश्चिम
में, हर ख़ुशियाँ मनाते हैं हमारे पुरुब में, उतरो
अबहीं उतरो, दुआर से’, और अच्छा
हुआ कि बिन
कुछ बोले वे
चले गए, आजी
दूर तक
उन्हें घूरते
देखती रही
–सुरुज
उग चुका था
मैं लोइया
ढो-ढो
दे रहा था, आजी गोबर पाथ
रही थी, पर जाने कहाँ तो खोई हुई थी, पूछा तो कहा, ‘असहीं बेटा, ला आज सब पाथ देती हूँ, कई दिनों से सड़
रहा है’, जब पाथ लिया, मुँह धोते जाने का सूझा, दुआर पर नाद बनाने को जो रखी थीं ईंटें, उठा-उठा आँगन में
रखने लगी, मैंने, माँ ने पूछा, जवाब दिया,
‘रे दुआर प रहे चाहे आँगन में, का फरक पड़ता है’,
सुरुज
उग चुका
था,
लेकिन, आजी को कहीं डूबा देख, लगता था–सुरुज उगा न चाँद निकला है
दु कौर खा
जब डेउढ़ी में खटिया पर ओठँगी थी, भीरी गया, ‘...आजी,
मालूम
है, तुम काहे उदास हो, बााबूजी ईंट खातिर जो चीखे-चिल्लाए, उसी
कारन न ?’, आजी कुछ देर चुप रही, फिर जाने का तो ढूँढ़ते
मेरी आँखों
में कहा,
‘बेटा, अब तुम सब भाई जल्दी
ही बड़े हो
जाओ,
बड़े हो जाओ कि बाप
पितिया पाछे, खाड़ रह सको
बेटा, बात ईंट की
नाहीं है
–ई
ऊ गाँव है जहँवा
हर, कमजोर अदिमी
मुसलमान है !’
(नोट : 9 फरवरी, 2019 को पोस्ट की गई टिप्पणी सहित कविता)
००
सुनिये मित्रो, कुछ दिन पहिले एक बड़े आलोचक ने कहा था कि बिहार में कविता का भविष्य ख़त्म हो रहा है। उन्हें निराश
होने की आवश्यकता नहीं है। इत्मीनान रखिए आदरणीय, अपने पास अभी शानदार और
उम्दा कवि कुमार वीरेन्द्र हैं।
० आधे गाँव की भौजी ०
होगी, सबकी ससुराल में, होगी नाइन, पर
मेरी ससुराल
की नाइन
जैसी कहीं कोई नाइन कहाँ,
मेरी ससुराल की
नाइन लगने
को
लगती है
सरहज,
कहने को कहते भौजइया, और भले
ही हो गई
है साठ की,
पर आज भी–उसके ऐसे कमाल, ऐसे जलवे, ऐसे मज़ाक़, ऐसे करतब,
ऐसे-ऐसे कि अपनी सास तो
दूर, साली-सरहज भी देखें तो देख-देख
शरमाएँ, गाड़ लें मुँह, हँसते-हँसते फूल जाए पेट, पानी-पानी हो
आएँ आँखें, और
पाहुन, पाहुन तो जैसे कैसे भी, अपने प्राण ले दुआर-दालान, खोरी कहीं भी भाग निकलने को ढूँढ़ें राह,
पर वह
ढूँढ़े से
भी न मिले कि वह बैठी होती वहीं, फिर कौन ऐसा पाहुन जो बने पाड़ा,
खुलवा के लुंगी, वह भी
ससुराल में, बड़ी अजीब है नहीं अजीब में अजीब है मेरी ससुराल की नाइन; एक बार
आँखों
देखा यह, गाड़ा जा रहा था साली का माड़ो, और भौजियों में हज़ार भौजी,
सालियों
में हज़ार
साली,
सरहजों में हज़ार सरहज कि पाहुन तो पाहुन, देवर
तो देवर
जो उसके
ससुर लगते,
लगते जो भसुर, उनको भी घोले हुए आटे
हल्दी, उबटन से लुक-छिप, भकोलवा बाबा बनाके
ही लिया
दम,
और आँगन में का मरद का
मेहरारू, क्या बच्चे, सब के सब
होते रहे
लोटपोट,
ऐसे
गड़ा माड़ो
कि सुधर
जाएगी
दुनिया, नहीं सुधरेगी ई गाँव की ई नाइन; और नहीं
सुधरेगी
तो न सुधरे,
चाहता भी कौन, इसीलिए तो सुनते सब, सब बूझते, रहते मौन, ऐसे लोगों
के गाँव की ऐसी है नाइन
ऐसी जो सुख
का दुःख,
दौड़ी आती ख़ाली पाँव दिन हो या रात, और गर्भवती
का उल्टा बच्चा भी सीधा कर, देती जनमा
बुढ़ियों-जवनकियों
की कमर का, भगाती फिरती ‘चोर’, दबाती फिरती उनकी देह, जिनके कई छूता न कोई
जबकि ख़ुद
नाइन का कौन आपन,
मरद गया जवानी में बिदेस लौटा न बुढ़ापे तक देस, बाक़ी कसर
बेटे-बहुओं
ने कर दी पूरी, कर दिया अलग, एक दिन हँसते-हँसते पूछा, ‘ए भौजइया, तू
नाइन पूरे
गाँव की,
तोहार कौन नाइन हो ?’, पता नहीं बूझा कि क्या,
चली गई
मुसकाते, ऐसी ही ऐसी अपने रंग में माटी, अपनी माटी की नाइन; तभी
तो जब एक
दिन,
ऐसे गिरी खटिया पर लगा बचेगी नहीं अब
देखते-देखते
हो गया पूरा गाँव जमा और एक मुँह
से कहा सबने, ‘कोई गाँव क्या, समूची
धरती प मिलेगी
कहाँ,
ऐसी
अपनी नाइन
सिर्फ
नाइन नहीं
अरे आओ भाई, कवनो जुगत भिड़ाओ भाई, गाँव अन्हार
होने से
बचाओ,
ई भौजी जी भौजी, भौजी आधे गाँव की !
००
० तरकुल ०
क्या ज़माना
था
ज़माना, भाई रामाधीन कि ताड़ की ताड़ी
पीते थे
तरकुल नहीं खाते थे पंडित जी, ताड़ी पीते थे तरकुल नहीं खाते थे बाबू
साहेब
ताड़ी पीते
तरकुल नहीं खाते थे यादव जी, अउर हई लाला जी, हई-हई भूमिहार जी
सोचिए, भाई रामाधीन, सोचिए कि क्या-क्या
विधान रच रखा था
इन जी अउर
साहेब लोगों ने,
जिस ताड़ का रस
पीकर, पंडित जी बने रह सकते
थे पंडित
जी,
बाबू
साहेब
बने रह सकते
थे
बाबू साहेब, यादव जी यादव जी, लाला जी
लाला जी, अउर भूमिहार जी भूमिहार जी ही, तब ताड़ का फल तरकुल खाकर
अछूत कैसे
हो जाते; अगर ताड़ का पेड़ डोम उसका फल डोम, तब उसका रस पवित्र कैसे
हो गया कैसे
भाई रामाधीन, कैसे कि खाते किसी ने देख लिया, बिन बूझे भूख,
हाहाकार
मच जाता, पंचायत बैठ जाती अउर वह खानेवाला ज़ात
से बाहर
कर दिया जाता;
फिर उसके घर
उसकी जाति
के न आते
बेटा ब्याहने
न आने देते
बेटी ब्याहने; कैसे दिन थे, कैसे
दिन, भाई रामाधीन, कुछ कहो कैसे दिन थे, जब कोई नशे में, कितना
भी धुत्त, कह सकता था, ‘ऐसी रसीली, रंगीली
ई ताड़ी, तड़बनवा लागे
मरद की मरदाही
हो’,
लेकिन भूलकर भी नहीं कह
सकता था–सुनो,
मेरे प्रिय, बहुत ही
प्रिय फल
का नाम है
तरकुल, हाँ
तरकुल...!
(नोट : 5 सितम्बर, 2019 और 15 फरवरी, 2020 को पोस्ट की गई टिप्पणी सहित कविताएँ)
००
दीपावली के आगमन के साथ ही भाई कुमार वीरेन्द्र की यह कविता दिमाग़ में कौंध
जाती है। दीपोत्सव के सांस्कृतिक पक्ष के साथ संवेदना के पक्ष की बात करते हुए कवि
ने अद्भुत रचना की है...!
० अन्हार ०
दिवाली के
दिन,
सब जलाते घर-आँगन
दुआर-बथान
पर दीये, एक बाबा ही जो
एक थरिया
में
तेल-भरे
पाँच दीये ले निकलते घर से, और जो
पुरनका इनार, पहले जलाते उसी पर एक दीया; फिर सीधे, बधार में पहुँच, खेत के एक मेंड़ पर, फिर एक दीया बग़ीचे में
ठीक बीचोबीच; इसके बाद एक नदी किनारे, और अन्त में एक वहाँ जहाँ बेर-बबूर बीच, गाँव के मृत बच्चे गाड़े जाते; मैं
जो बाबा
के संगे-संग, देखता जब पंचदीये जला चुके, सुस्ताने कि खैनी खाने के बहाने कुछ देर बैठे रहते, पूछता
‘बाबा,
इनार प दीया काहे जराते हो, पानी देता है,
इसलिए ?’; बाबा हाँ में मूँड़ी हिलाते, फिर पूछता
‘खेत
प दीया काहे जराते हो, अनाज देता है, इसलिए
?’ बाबा फिर हाँ में हिलाते मूँड़ी, इसी
तरह पूछता, ‘बगीचे में दीया काहे जराते हो, आम फरता है, इसलिए ? नदी किनारे
दीया काहे
जराते हो,
नहाते हैं हम, इसलिए ?’; फिर जब पूछता, ‘बाबा
ई बताओ, इहँवा दीया काहे जराते हो, इहाँ तो इनारो नाहीं
खेतओ नाहीं, बगीचओ नाहीं, नदिओ नाहीं ?’
बाबा ने, अब तक जो खाली मूँड़ी
हिलाते रहे, मौन तोड़ते
कहा, ‘हँ बेटा
इहँवा
इनार, खेत, बगीचा, नदिओ नाहीं तबहुँ
तबहुँ, जरा देता हूँ, एगो दीया कि आज
अँजोर अन्हार न लगे...!’
(नोट : 27 अक्टूबर, 2019 को पोस्ट की गई टिप्पणी सहित कविता)
००
कुमार वीरेन्द्र को पढ़ना हमेशा एक अलग अनुभव रहा है। जब भी लिखते हैं, अलग लिखते हैं। मन भीतर
तक भीग जाता है। बधाई, कवि इस सुन्दर
कविता के लिए।
० चाय पीनेवाले प्रेमी ०
ये दो प्रेमी, जो अब, बूढ़े हो चुके हैं, इस होटल
में लगातार
चालीस वर्षों से चाय पीते आ रहे हैं
सुना जाता
है
इन्हें इसी
होटल में चाय पीते-पीते प्यार हुआ था
हालाँकि
एक सम्बन्ध बनने के पहले से, इस होटल में चाय पीते आ रहे हैं;
किसी ने इन्हें इस होटल में खाना खाते हुए कभी
नहीं देखा, नाश्ता करते हुए भी, जिन्होंने देखा चाय पीते देखा,
और बातें करते हुए, पर किसी ने इनकी बातें कभी
अक्षरशः
स्पष्ट नहीं
सुनीं,
हालाँकि मुस्कुराते, हँसते, उदास होते और रोते हुए, कइयों ने स्पष्ट रूप से देखा
है, लोगों का मानना
है, इन्हें राजनीति और इतिहास में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं शायद कि अपने वर्तमान
पर बहस करते अतीत
पर विचारते, किसी ने आज तक, भाँपा तक नहीं; इन्हें जितनी जल्दी होती है, सड़क पार करने की
उतनी ही
जल्दी होती है,
भीड़ से बाहर निकलने की पर जाने क्यों भीड़-भरे इस
होटल
में इन्हें
कभी जल्दी नहीं हुई;
इन्हें अक्सर देखा गया है जब आते हैं हाथ में
एक पुरानी
डायरी होती है और एक क़लम पर वह पुरानी नहीं
इनके कपड़ों
से,
फूल-सी ख़ुशबू आती है, हालाँकि
फूल बूढ़े
की ज़ेब में न बुढ़िया के बालों में
दिखते, ये एक-दूजे, के प्रेमी
लगातार चालीस
वर्षों से
इस होटल
में
पैदल चलकर
आते रहे हैं पर इन्हें साथ आते
हुए, कभी-कभार ही किसी ने देखा होगा, इनके मुहल्ले के लोग, इस होटल में जब आते हैं,
चाय पीने खाना खाने, उन्हें
इनके बारे
में
‘पागल हैं’, कहते सुना गया है, बाक़ी और कुछ नहीं कि वक़्त के इस मोड़ पर आ चुके हैं ये चाय पीनेवाले
बाक़ी और
कुछ,
कहनेवालों में से कितने कबके मर-खप गए,
कितनों की दिलचस्पी नहीं रही, अब तो जो हैं
आदर ही करने
लगे हैं,
पर वेटरों ने, इन्हें दिल से आदर, कभी नहीं किया कि अपने प्रेम-जीवन में
इन्होंने
एक बार भी किसी वेटर को चवन्नी क्या एक अधन्नी नहीं दी, जबकि ये दोनों शिक्षक
शिक्षिका
रहे हैं,
किसी-किसी से पता चलता है–कुछ विद्यार्थी इनका बहुत सम्मान
करते थे
कि ये उनकी ग़लतियाँ,
ज़्यादातर माफ़ कर देते थे, और पढ़ाते
थे तो बस
पढ़ाते थे,
बात नहीं करते थे सुनते भले थे, ये चाय
पीनेवाले
प्रेमी,
जो कबके सेवानिवृत्त हो चुके अब
तक ग़ैर-शादीशुदा
हैं, पता नहीं अलग
अलग मुहल्ले
में,
रहनेवाले
अपने घर के ये
अकेले
प्राणी, जब इस दुनिया से–जाएँगे, वह कौन
सी
अधूरी इच्छा
होगी,
जिसे पूरी तरह पाना चाहेंगे
और पाकर छोड़ जाएँगे !
(नोट : 28 अक्टूबर, 2019 को पोस्ट की गई टिप्पणी सहित कविता)
००
कोरोना त्रासदी में लोग हज़ारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँव क्यों लौटना चाह
रहे हैं, क्या है ग्राम-जीवन में जो खींच लाता है लोगों को अपने थान पर...पढ़िए भाई
कुमार वीरेन्द्र की जीवन्त कविता और बूझिए इस बात को...!
० सतुआन ०
बाबा के
साथ
हम भाई-बहन
बैठते खाने, पहले हमारे
मुँह कौर
डालते,
फिर ख़ुद खाते, पर सतुआन के दिन, जब उनको बड़कवा थरिया में
सत्तू, चटनी, अचार, प्याज़ दिए जाते,
और वे हमें न खिला, सत्तू की पेंड़ी बना,
बैलों
को खिलाने
चल देते, हम भाई-बहन पाछे-पाछे जाते,
उन्हें खिलाते
टुकुर-टुकुर
देखते, फिर वे सामने हाथ जोड़ कहने
लगते, ‘कवनो गलती हुई हो, माफ कर
देना, आप लोग घर के
सवाँग हैं’
हम भी हाथ
जोड़े दुहराते, बाबा खिल जाते
एक बार
जानना चाहा, ‘रोज हमें खिलाते हो
सतुआन के
दिन,
बैलों को पहिले काहे खिलाते हो, सवाँग तो हमहुँ
हैं...’, बाबा निहारते
मूँड़ी हिलाते
कहने लगे,
‘ई अनबोलता सवाँग हैं बेटा, जो हल चलाते नाहीं
हल खींचते
हैं, इन्हें न भी खिलाएँ, कहेंगे थोड़े, बस यही है, बेटा, हमें तो सालों
अन्न ही
खाना,
ई सतुआन जो नयका अन्न का दिन
जब पहिले
इन्हें खिलाकर खाएँ तो
लगता है, पेट ही नाहीं
मन भी
अघा गया !’
००
(नोट : हिन्दी के महत्त्वपूर्ण मार्क्सवादी अध्येता संतोष कुमार झा जी द्वारा फ़ेसबुक पर 14 अप्रैल, 2020 को पोस्ट की गई टिप्पणी सहित कविता)
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