Saturday, September 3, 2022


                                                                    गौरव पाण्‍डेय


कुमार वीरेन्‍द्र भाई !

कुकाठयथार्थ का गहन बिम्ब निर्मित करनेवाली सहज सम्‍प्रेषित कविता है। बहुत महत्त्वपूर्ण संवेदना और स्थिति को शब्दों से दृश्य में आपने सदैव के लिए बाँध दिया हैअद्भुत और सजीव कविता है यह। जब भी आपके कवि को याद करेंगे, यह कविता भी याद आएगी। निश्चित रूप से इस जीवन को आपने बहुत क़रीब से भोगा है। यह शब्द आपके कवि और उस खेतिहर दोनों के संघर्ष का एक सघन बिम्ब निर्मित करते हैं।

श्रम, संघर्ष और उम्मीद के बीच खेतिहर-जीवन की विकट त्रासदी का एक बिम्ब है यह !

मुझे ख़ुशी है, हम मित्र हैं इस माध्यम पर

 

० कुकाठ ०

 

खेतिहर

गड़ही से उलीच रहा, उलीच

रहा कि काछ रहा, भीग रहे, केवल भीग रहे ढेले, उलीचते कि काछते जब थक गया हार गया

लगा दरकने-डहकने, ‘अरे परभुआ...परभुआ रे...छोड़ दे गँउआ, इहॉं कुछुओ नाहीं...नाहीं रे

परभुआsss; परभुआ, उसका नाम न कोई और, चौदह बरस का इकलौता बेटा है

जो ला ही रहा होगा, खाना-पानी; खेतिहर बैठा है मेड़ पर, देख-देख खेत

देख रहा गड़ही, देख-देख गड़ही, देख रहा खेत, इस देखम-देख

में, जाने क्या दिखा, देखने लगा है, चिहा-चिहा ओर

चहुँओर; और दुपहरिया है कि बिलगोह की

जीभ-सी लपलपा रही लप-लप

देखते-देखते हठात्

मुस्कुराने

 

लगा है

यह क्या, दौड़कर भर अँकवार

भर रहा फ़सल, चूम रहा झूम रहा, झूमते-चूमते ठठा-ठठा हँसने भी लगा है, ऐसी हँसी गूँजने

लगा है आर-कगार समूचा बधार, क्यों तो एक--एक अकबका-सा गया है खेतिहर, ओर न

चहुँओर, ख़ुद को ही देखते देख रहा, बाँध पगड़ी, कसके खोंसने लगा है पछुआ

और उतर रहा फिर गड़ही में, एक बार, एक बार और; उतर गड़ही में

खेतिहर जैसे कभी न थकने, हारनेवाला, जैसे बहुत, बहुत

ही जल्दी में हो, उलीचने लगा है, उलीचने कि

काछने, पानी, पानी...पानी ही कि

क्या पता, क्या ? न भर

रहा चुल्लू

 

न भीग रहे ढेले...!

००

(नोट : हिन्‍दी के युवा कवि और आलोचक गौरव पाण्‍डेय जी द्वारा फ़ेसबुक पर 27 सितम्‍बर, 2016 को पोस्‍ट की गई टिप्‍पणी सहित कविता)

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