Wednesday, August 31, 2022


                                                                        नीरज सिंह

पढ़िए मेरे प्रिय कवि कुमार वीरेन्‍द्र की यह अद्वितीय रचना। ऐसी भावपूर्णलोकचेतना से संपृक्त और लोकभाषा की शक्ति एवं सौन्‍दर्य से परिपूर्ण कितनी रचनाएँ लिखी जा रही हैं इन दिनों, जिनमें प्रखर वैचारिकता भी अपने उत्कर्ष पर हो ?


० रेंगनी ०


अब नदी से भी 

का बतियाता, ऊ भी पराई लगने लगी 

थी; जिन पेड़ों को बाबा की तरह, अँकवारी भरता, जो केहू से नाहीं बस उनसे कहता, उनका भी 

साथ, अनभुआर, लगने लगा था; देखता, फुदकती चिरइयों को, सोचता–‘ई भी माई, चाची, दीदी

भौजी जैसी ही, जादे ठीक नाहीं मोह-माया’; बधार में जो लउकते, ताकते रह जाता

ई सब जब मू जाएँगे, ई खेतवन का का होगा, हर कवन चलाएगा, बुआई 

कइसे होगी; बथान पर चढ़ बैलों के गले लगता, सुहुराता और 

मुट्ठी-मुट्ठी घास खिलाता; सोचता–बाबा से कहूँगा

देखो, भँइस बेच दो, पता नाहीं, जब 

हम नाहीं रहेंगे, माई-चाची 

तो गवत काटने से 

रहीं, एक 


अकेले आजी कतना काटेगी 


घर में क्या गाँव 

में भी कवनो मेहरारू-लइकी को नाहीं देखता 

मूँड़ी गाड़े गुज़र जाता, केहू बुलाए अनसुना कर बढ़ जाता; कवनो भौजी कहती एगो सुग्गा खोंड़िला से निकलवा 

लाने को, तपाक कह पड़ता, ‘काहे उसे भी मुआना है का ?’, वे चुप टकटकियाए भकुआए रह जातीं; कि का तो 

हुआ एक साँझ, बगीचे में जो बकरी चर रही थी, उसके पाठे को पकड़ पूछता रहा, ‘तोहरी माई-दीदी 

भी सरापती हैं ? पूछो, हम दुस्मन हैं का ?’; एक दिन आँगन में कल पर, फिसल ऐसा गिरा

आँख तो बच गई लेकिन भौं कट जाने से, इतना ख़ून गिरा, आजी संग सब की सब 

टूट-फूट पड़ीं, जब कहा, ‘अब तुम लोग काहे रो रही हो, ऊ दिन तो रेंगनी 

का काँट जीभ प रख-रख सराप रही थीं–भइयवा, बेटवा, दमदा

सब मू जाएँ’; इस पर वे का कहतीं...पर आजी ने जो 

कहा, इहे जान पाया–धरती पर ई स्त्रियाँ ही 

हैं जिनके सरापने से भी अपनों 

की उमर बढ़ती है– 

बजड़ी के 


बूँट जइसन, फलते-फूलते हैं !


०० 

(नोट : हिन्‍दी के महत्‍त्‍वपूर्ण कथाकार नीरज सिंह जी के फ़ेसबुक पर 30 अक्‍टूबर, 2019 को टिप्‍पणी के साथ पोस्‍ट की गई रचना।)

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