Wednesday, August 31, 2022


राज्‍यवर्द्धन

कुमार वीरेन्‍द्र समकालीन हिन्‍दी युवा कविता के ऐसे कवि हैं जो लोक व देशज विषयों से हिन्‍दी कविता को निरन्तर समृद्ध कर रहे हैं। प्रस्तुत हैउसकी ताज़ा कविता सगखोटनी। जीवन की न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति भी कितना कठिन है।


० सगखोटनी ०

 

खोंट रहींखोंट रहीं

साग सगखोटनीकभी इस खेत उस खेतखेत-खेत भर

रहीं फाँड़ सगखोटनीकोई चिल्ला रहाकोई गरिया रहा

लेके लाठीचहेट रहा दूर तकहवा में

ले प्राणउड़ रहीं फर्र-फर्र

सगखोटनी

 

रे सगखोटनी

 

मेंड़ पर बैठी हाँफ रहीं

फूल रहा दम तबहुँ देखो पाँत में चहक रहीं चिरईंचहकते नमक-अचार संग

खा रहीं साग सगखोटनीलोउड़-उड़ बैठींफिर किसी के खेतमूँड़ रहीं बूँट

मटर-खेसारीरोज़ कहाँ कोई खुदे बुलाए कि खोंटने से

खेत और लहलहाएकेहू ना खोंटवाए

का करें सगखोटनी

 

रे सगखोटनी

 

ऐसी सखियाँकम खोंटा

जिसनेखोंट देतीं उसकानाहीं हो मोटरी-भर सागजातीं नहीं घर सगखोटनी

राह में बोला किसी ने कुबोलएकवट जातींसुनतीं दो ताल ठोंक सुनातीं चार

कहते कहनेवालेबड़ी ढीठ हैंबेटी नाहीं ई बजर ईंट हैं

सब लाज-शरम परगटे घोर के पी गई

हैंहई सगखोटनी

 

रे सगखोटनी

 

निर्ह रहीं कड़ाही

मेंसाग कि आपन भागमाँड़-भात खातेभूल गईं जो माएँ

स्वादमिलते महकऊ पड़ोसिनें आईं जिनकी एको न जाई

ख़ूब दी दुहाईएगो लोइया-भर साग को

कि धन्य हे बसन्त ऋतु

धन्य हे धरती

 

धन्य रे बेटियाँ 


बेटियाँ हो सगखोटनी !

००

(नोट बिजूका’ के साथ हिन्‍दी के चर्चित कवि राज्‍यवर्द्धन जी के फ़ेसबुक पर 22 नवम्‍बर, 2018 को टिप्‍पणी के साथ पोस्‍ट की गई यह रचना।)

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