राज्यवर्द्धन
कुमार वीरेन्द्र समकालीन हिन्दी युवा कविता के ऐसे कवि हैं जो लोक व देशज विषयों से हिन्दी कविता को निरन्तर समृद्ध कर रहे हैं। प्रस्तुत है, उसकी ताज़ा कविता ‘सगखोटनी’। जीवन की न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति भी कितना कठिन है।
० सगखोटनी ०
खोंट रहीं, खोंट
रहीं
साग सगखोटनी, कभी इस खेत उस खेत, खेत-खेत
भर
रहीं फाँड़ सगखोटनी, कोई चिल्ला रहा, कोई गरिया रहा
लेके लाठी, चहेट
रहा दूर तक, हवा में
ले प्राण, उड़ रहीं
फर्र-फर्र
सगखोटनी
रे सगखोटनी
मेंड़ पर बैठी हाँफ रहीं
फूल रहा दम तबहुँ देखो पाँत में चहक रहीं
चिरईं, चहकते नमक-अचार
संग
खा रहीं साग सगखोटनी, लो, उड़-उड़ बैठीं, फिर किसी के खेत, मूँड़ रहीं बूँट
मटर-खेसारी, रोज़ कहाँ कोई खुदे बुलाए कि खोंटने से
खेत और लहलहाए, केहू ना खोंटवाए
का करें सगखोटनी
रे सगखोटनी
ऐसी सखियाँ, कम
खोंटा
जिसने, खोंट
देतीं उसका, नाहीं हो मोटरी-भर
साग, जातीं नहीं घर सगखोटनी
राह में बोला किसी ने कुबोल, एकवट जातीं, सुनतीं दो ताल ठोंक सुनातीं चार
कहते कहनेवाले, बड़ी ढीठ हैं, बेटी नाहीं ई बजर ईंट हैं
सब लाज-शरम परगटे घोर
के पी गई
हैं, हई
सगखोटनी
रे सगखोटनी
निर्ह रहीं कड़ाही
में, साग कि
आपन भाग, माँड़-भात खाते, भूल गईं जो माएँ
स्वाद, मिलते
महक, ऊ पड़ोसिनें आईं जिनकी एको न जाई
ख़ूब दी दुहाई, एगो लोइया-भर साग को
कि धन्य हे बसन्त ऋतु
धन्य हे धरती
धन्य रे बेटियाँ
बेटियाँ हो सगखोटनी !
००
(नोट ‘बिजूका’ के साथ हिन्दी के चर्चित कवि राज्यवर्द्धन जी के फ़ेसबुक पर 22 नवम्बर, 2018 को टिप्पणी
के साथ पोस्ट की गई यह रचना।)
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